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हिंदू सण: दिवाळी, होळी, नवरात्रीचे महत्त्व आणि इतिहास

हिंदू सण: दिवाळी, होळी, नवरात्रीचे महत्त्व आणि इतिहास

Hindu Festivals: Importance and History of Diwali, Holi, Navratri

हिंदू  धर्म  हा  जगामधील  तिसऱ्या  स्थानावरील  सर्वात  मोठा धर्म  आहे.  हा  धर्म  खूप  मोठया  प्रमाणात  मानला  जातो याचे  ऐकून  अंदाजी एक अब्ज  अनुयायी  आहेत. हिंदू  धर्मा  मध्ये  इतर  धर्मा  सारखा  संस्थापक  नाही  व  हिंदू  धर्मा  मध्ये  अनेक  परंपरा  आहेत. हिंदू  धर्मा  मध्ये  अनेक  ग्रंथ  काव्ये  याचा  समावेश  आहे.  त्या  मुले   हिंदू  धर्म  हा खूप  जुना  धर्म  मानला  जातो. हिंदू  धर्मा  मधील अनुयायी  वर्ष  भरामध्ये  अनेक   हिंदू  सण  साजरे  केले  जातात  त्या  मध्ये  मुख्ये  सण  म्हणजे गुढी पाडवा, राम नवमी, हनुमान जयंती, नारळी पौर्णिमा, मंगळा गौर, जन्माष्टमी, गणेशोत्सव, कोजागिरी, दिवाळी, मकर संक्रांती, शिवरात्री आणि होळी  या सारख्या   हिंदू सण  चा  समावेश  आहे.  

हिंदू  धर्माची  उत्पत्ती  हि ५०००  वर्षाहून अधिक  वर्ष  झाली आहे.  या  मुले हिंदू धर्म हा खूप  जुना व जटिल  मानला जातो.  हिंदू हा सम्पूर्ण विश्वाला देव मानत असतो .हिंदू धर्म  हा  कोणत्याही  दुसऱ्या  धर्माला  हिंदू  धर्मा  मध्ये  अनेक  देवाचा  समावेश  आहे. त्या  मध्ये  मुख्ये  तीन  देव  आहेत पहिला  म्हणजे  ब्रह्मा  देव  ब्रह्मा  देव  ला निर्माता  या नावाने ओळखले जाते  ब्रहम देव  सुर्ष्टी  निर्माण  करण्याचं  काम  हे  करत  असतो. दुसरा  देव   म्हणजे विष्णू  देव  विष्णू  देवाला पालनकर्ता  या नावाने ओळखले जाते सुर्ष्टी   टिकवणे  चे  व  पुथ्वी  तलवार  घडणाऱ्या  प्रत्येक  कोष्टी साठी  विष्णू  जबादार  असतात  तिसरे  देव  म्हणजे शिव  हा  देव  एक ठराविक  कालावधी मध्ये  सुर्ष्टी  नष्ट  करतो याचा  भगवद गीता  रामायण  व  या सारख्या  अनेक  महाकाव्येचा  समावेश  आहे. हिंदू  धर्मास  सनातन  धर्म असे  सुद्धा म्हणले  जाते  हिंदू  हिंदू  धर्माचा  उद्देश  हा  अधामिक  ज्ञान  मिळवणे हा असतो  हिंदू  धर्माचे  महत्व  हे  हिंदू  धर्म  हा  खूप  जुना  आहे  व  हिंदू  धर्म  मध्ये  ओम   याला देखील खूप  महत्व  आहे. 

प्रमुख हिंदू सण 

  • दिवाळी


दिवाळी


दिवाळी  हा  सण  खूप  आनंदाने  साजरा  केला  जातो. दिवाळी  हा  सण  प्रकाशयचा  आहे.  यामध्ये  घर  हे दिव्याने  सजवले जाते  दिवाळी   या  सणाला  मुख्येतू  दीपावली  या  नावाने सुदा  ओळखले जात  आहे. दिवाळी  हा सण  सम्पूर्ण  भारता  मध्ये  साजरा केला  जातो   पण  फक्त  इतर वेगवेगळ्या  रूप  मध्ये   भारतीय  इतर  धर्मांमध्ये  साजरा  केला  जातो  प्रत्येक  धर्माचे  वेग वेगळे  नियम  परंपरा  आहेत. 

अर्थ आणि इतिहास

दिवाळी  या  सणाला अंधारावर  प्रकाशयाचे  वाईट  गोष्टीवर  चांगल्या  गोष्टीचा  विजयाचे  प्रतीक  मानले  आहे.  हा  सण  हिंदू  कॅलेंडर  नुसार  कार्तिक  महिन्यात  व इंग्लिश  कॅलेंडरनुसार सप्टेंबर  व  नोहेंबरच्या  मध्ये  येत  असतो.  हा  सण ५  दिवसाचा  कालावधी  मध्ये  साजरा  केला  जातो  दीप  म्हणजे  खोल  याचा अर्थ प्रकाश  व  वली  याचा  अर्थ  हा पंक्ती  असा  हा  दीपावली  या  शबदाचा  अर्थ  होतो. 

दिवाळी  या सणाला प्राचीन  भारताच्या  काळामध्ये  दिवाळी  हा  सण  मुख्येतू  शेतकरी  लोक  साजरा  करत  होते. त्या  वेळी  साधारपणे  ऑक्टोम्बर  ते  नोव्हेंबर  या महिन्यात  शेतकरी  आपल्या  पिकाची  कापणी  करत  होते  या मुले  कीटकाचा  मोठ्या  प्रमाणात  धोका  होता  हा धोका  टाळण्यासाठी  शेतकऱ्याने  कीटकांना  आकर्षित  करून  नष्ट  करण्यासाठी  घरामध्ये  दिव्ये  लावण्यास  सुरवात  केली  व हि  योजना  सफल  झाली  यामूल्ये  हि  योजना फोडी जाऊन  परंपर झाली  व दिवाळी हा सण साजरा होऊ  लागला. 

धार्मिक महत्त्व

हिंदू  धर्मा  मध्ये  दिवाळी  या सणाला  खूप  महत्व आहे  कारण  भगवान  राम  हे १४ वर्ष  वनवास  भोगून  व  १० मुखी  रावणाचा  प्रभाव  करून  राम  त्याची  पत्नि सीता  व  भाऊ  लक्ष्मण  याच्या  सोबत  ओयेधेत  परतले  होते  तेथील  ओयेथेतील  लोकांनी  आपल्या  राजाचे  स्वागत  करण्यासाठी  दिवे  लावून  पूर्ण  ओयेथनगरी  सजवली  होती  या  मुले  दिवाळी  सणाशी सुरवात झाली. 

तो कसा साजरा केला जातो

दिवाळी  हा सण  पाच  दिवसाच्या  कालावधी मध्ये  साजरा केला  जातो.  प्रत्येक  दिवस वेगवेगळे काय तरी केले जाते दिवाळीचा पहिला  दिवस  म्हणजे धनत्रयोदशी  या  नावाने  त्या  दिवसाला ओळखले  जाते. या दिवशी  खराची घराची  स्वच्छता  करून  दिव्ये लावले जातता व दिवाळी  सुरवात  होते व नवीन  कपडे दगानी खरीदी केला जातात.   

दुसऱ्या  दिवशी  म्हणजे  मिनी दिवाळी  याला  नरक  चतुर्दशी असे दिखील म्हणतात.  या दिवशी मिठाई  वेगवेगळी  बनवले जाते व वाठली जाते. तिसरा  दिवस  हा  दिवाळीचा  मुख्ये दिवशी मानला जातो  याला  लश्मी  पूजन असे हि म्हणतात  या दिवशी लक्ष्मी  या दैवी  ची  पूज्य  करून  घरामध्ये  येण्याचे आव्हान  केले  जाते  व फटाके  फोडत  व नातेवैकांना  भेटतात. 

दिवाळीचा  चवथा दिवशी म्हणजे  गोवर्ध पूजा हा दिवस  श्री  कुष्ण  यांनी  गोवर्धन  पर्वत  करंगळी  वर उचलून शेतकऱ्यांना  पुरापासून  वाचवले होते या मुले हा दिवशी साजरा केला जातो.पाचव म्हणजेच  दिवाळीचा  शेवटचा  दिवस  याला भाऊ  बीज  या नावाने ओळखले  जाते या  दिवशी  भाऊ  व  बहिणींनी सामायिक  केले सुंदर  बंधन साजरे  केले जाते. 

  • होळी
होळी


होळी  हा  एक  भारतामधील  लोकप्रिय  हिंदू सण  आहे. होळी  हा  एक  असा  सण  आहे  कि  भारत  सुडून  इतर  देश्या  मध्ये  सुदा  होळी  हा  सण  साजरा  केला जातो. भारत  मध्ये  वेगवेगळा  स्वरूपात  होळी  हा  सण  साजरा  केला  जातो. जसे  महाराष्ट्र  मध्ये  लाकडे  गोळा  करून  एका  ठराविक  अकरा  मध्ये  मांडून  जाळली  जातात व पेटलेल्या  होळी  भवती लोक  मोठ्याने बोंबा मारत  फेऱ्या  घालतात.  

व  परत  होळी ला  नारळ  अर्पण  करून  नैवेद्य दाखवतात  परत  ५ दिवसांनी  रंगपंचीमी  हा  सण  साजरा  केला  जातो . असे देखील  म्हणतात  कि  होळी   होळी  दहन  झाल्या  नंतर  थंडी  कमी  होती.   हा  सण  वाईटावर  चांगल्याचा  विजयी असे सूड प्रतीक  आहे. कारण  पौराणिक  कथे  नुसार विष्णू  या  देवाचे  रूप  हिरण्यकश्यपूवर नरसिंहा याचे  विजययाची  हा  सण  आठवण  करून  देतो. 

 रंगांचा सण  होळी

होळी  हा  एक  असा  हिंदू  प्राचीन  सण  आहे  कि  जी  भारतातील  अनेक  राज्य  मध्ये   व काही  इतर   देशा  मध्ये  भारत  सोबत  प्रादेशिक  सुट्टी  आहे. हा  एक  असा  हिंदू  सण  आहे जो  जात  लिंग  व  वय  बघत  नाही  सगळ्याना  तो  रंगीत  पाणी  व  रंगाने भरले  फुगे  फेकून मज्या  करण्याची  संधी  देतो  होळी  हा सण  सर्व  जाती  धार्माच्या लोकांना  एकत्र  येण्याची संधी  देतो.होळी  हा  सण  वसंत  ऋतू  ची  सुरवात  आहे . होळी  या  सना  मध्ये  एकमेकानावर  रंग  फेकला  जातो  व  हिच  या सणाची  ओळख  आहे .  या मुले  या सणाला  रंगाचा  सॅन  देखील  म्हणतात. 

होळी  सणाची उत्पत्ति आणि पौराणिक कथा

होळी  या  हिंदू  सना  साठी  अनेक  दंथ  कथा  व  पौराणिक  कथा  प्रसिद्द  आहेत  होळी  या  सणाचे  मुळे  हे  प्राचीन भारत  मध्ये  अनेक  खोलवर  रुजली  आहेत.  घमंडी  व  ताकातवर  राक्षसी राजा   हिरण्यकशिपू  आणि त्याचा  मुलगा  प्रल्हाद याची  कथा  खूप  प्रसिद्द  आहे. 

हिरण्यकशिपू   या  राजेंचा  मुलगा  प्रल्हाद  याने आपल्या  वडिलांचा  म्हणजे  राज्या  हिरण्यकशिपू  च्या  विरुद्धत  जाऊन  विष्णू  या  देवतांची उपासना  केली  व  विसनू या देवाची  भक्ती करत होता म्हणून  हिरण्यकशिपूने  प्रल्हाद  ला मारण्याचा   प्रयत्नाने  त्याच्या  बहिणी  होलिका हिला जिवंत  जाळण्याचा  कट  रचला  पण  दिव्ये  शक्ती  मुळ्ये  प्रल्हाद  ला  काही  सुदा  झाले  नाही  पण  त्याची  बहीण  होलिका  हि मरण  पावली  म्हणून  वाईटावर  चांगल्याच विजयी  म्हणून  होळी  हि साजरी  होऊ  लागली. 

दुसरी  कथा  अशी  आहे कि  राधा  आणि  कृष्ण  पुराणिक  कथे   नुसार कुष्ण  यांची  त्वचा हि  राक्षसणी  निळी  केली  होती  व  राधा  याची  खूप  गोरी  त्वचा  होती  त्यामुळे  श्री  कुष्ण  यांनी  यशोदा मा  याना  हा प्रश्न  विचारला  त्यावेळी  यशोदा  मा यांनी  राधाला   रंग  लावण्याचा  सला  दिला  व  कुष्ण यांनी  रंग  लावला  व   सर्व  गावकऱ्यांना  हे खूप  आवडले  व रंगाच्या  होळी ला सुरवात  झाली. असे  देखील  म्हणतात  कि  रंगाची  होळी  या  त्या दिवस पासून सुरवात  झाली.  प्रत्येक  संदर्भ  मध्ये  वेगवेगळी  कथा  हि  श्री  कुष्ण आणि राधाची आहे.    

  • नवरात्री

नवरात्री


नवरात्री  हा  एक  सगळ्यात  मत्वाचा  हिंदू  सन आहे  यामध्ये  भगवान  शिव  यांची  पत्नी  ची  म्हणजेच  देवी दुर्गा  या देवीची  नऊ  रूपाची  पूजा  केली  जाते  या सण चा मुख्ये हेतू  हा असतो कि  पराशक्तीचा एक बाजू सर्वोच्च देवी यांच्या सन्मान  करण्यासाठी  नवरात्री  साजरी केली जाते नवरात्री  हि  ऐकून  नऊ  दिवस  साजरी केली जाते  नवरात्री  हि  हिंदू  भारत संस्कृती  मध्ये  वेगवेगळ्या  भागामध्ये  वेगवेगळ्या  पद्धतीने  साजरी  केली जाते. 

देवी दुर्गाला समर्पित नऊ दिवसांचा उत्सव

प्रचीन  अनेक  संख्या  शास्त्रानुसार  आपल्या  वर्ष्याची  एख  आखणी  केली  आहे. ज्याला  ४० नऊ  रात्री  म्हणजे  ४०×९=३६०  अशी  दिवसाची  आखणी  आहे. या  ४० नऊ  रात्री  पैकी  प्रमुक  तीन  नऊ  रात्री  या  देवीच्या  पूजे  साठी  वापरतात त्यांना  चेत्र  नवरात्री , शरद  नवरात्री  व शारदीय  नवरात्री  या  नावाने  ओळखले  जाते. चेत्र  नवरात्री  व शरद  नवरात्री  या  दोन  नवरात्री  बऱ्यापैकी  जास्त  प्रमाणात  साजऱ्या  केल्या जात आहे. 

हे.शारदीय  नवरात्री  हि  वसंत  ऋतु मध्ये  साजरा  केली  जाते  या  तिने  नवरात्री  भारत  मध्ये  वेगवेगळ्या  भागामध्ये  वेगवेगळ्या  स्वरूपात  साजऱ्या केल्या जातात. नवरात्री चा  संबंध  हा  देवी दुर्गा व राक्षस  महिषासुर  प्राचीन  कुठे नुसार  जोडला  गेला  आहे.  भगवान  ब्रह्मदेव  यांनी   महिषासुर  याला  आम्रवतेचे वरदान  दिले होते  हे  वर्धन  अस्या  स्वरूपात  होते  कि  फक्त  स्त्री   च  महिषासुर  वध  करू शेकत  होती.

यामुळे  दुर्गा  माता  यांनी  महिषासुर   यांनी  नऊ  दिवस  व नऊ  रात्री  युद्ध  केलं  व  प्रत्येक  दिवशी  वेगवेगळ्या  रूपा  मध्ये  देवी  हि  लढत  होती  व  शेवटी  दहाव्या  देवासी महिषासुर याचा  वध  केला  यामुळे  या  दिवसाला  विजयादशमी  या नावाने ओळखता  व  जर  वर्षी  साजरी  केली  जाते  नवरात्र  म्हणजे  नवीन  सुरवात  म्हणून  नवरात्री  हा  सण  नवीन सुरवाती साठी  चांगला  आहे. 

  • महा शिवरात्री
महा शिवरात्री

महाशिवरात्री  हा  हिंदू  संस्कृती  मधील  प्रमुख  सण  आहे.  महाशिवरात्री  हा  सण  भारत  देशा  मध्ये  मोठ्या  प्रमाणात  साजरा  केला  जात  आहे. भगवान  शिव  आणि  त्यांची  पत्नी  पार्वती  यांचा  विवाह  झाला  होता  यामुळे या महाशिवरात्री  या दिवशी  भगवान शिव  आणि  पार्वती  यानअची  पूजा  केली  जाते  व  भारत  समवेत  इतर  देशा  मध्ये  सुदा  मोठ्या  प्रमाणात  महाशिवरात्री  हि  साजरी  केली  जात  आहे. 

भगवान शिवाला समर्पित महत्त्व  

भगवान  शिव  यांचा  प्रमुख  सण  म्हणजे  महाशिवरात्री  प्रामुख्याने  कुष्ण  पक्ष  फाल्गुन  म्हणजेच  इंग्रजी  महिना  फेब्रुवारी  ते  मार्च  महिना  मध्ये  हा  सण  येतो.  या  दिवशी  लोक  खूप आनंदाने  उपास, जागरण  व  प्रार्थना  करतात. शिवभगत  मोठ्या   श्रद्धेने  उपासना  व  प्रार्थना जागरण  करत   असतात. 

कारण  यामुळे  मन  सवोच्च  होते  व  अधामिक  कडे  आपले  विचार  ओढण्यास  सुरवात  होत असते.उपास  व  प्रार्थना करणे  हे भगवान  शिव  याना प्रसन्न  करण्याचा एक  मार्ग  आहे भगवान  शिव  खूप  दयाळू  देव  आहेत हे भक्तानी थोडी जर प्रसन्न  करण्याचा  प्रयतन  केला  कि देव  लगेच  प्रसन्न  होतात. भगवान  शिव  खूप   रागीट  सभावाचे  देव मानले जातात  कारण  याच्या  कड सृष्टी नसत्ये करण्याचे सामर्थ  आहे. 

अनोखे सण

  • रक्षाबंधन

रक्षाबंधन

रक्षाबंधन  हा  सण  भारतामधील  हिंदू  संस्कृती  मधील  सगळ्यात  पवित्र  सण  आहे. हा  सण  बाहू  आणि  बहीण  यांच्या  मधील   बंधन  मजबूत  करण्या  साठी  हा  सण  साजरा  केला  जातो  हिंदू  संस्कृती  मध्ये  या  सणाला  खूप  महत्व  आहे. रक्षाबंधन  या   सण मध्ये  बहीण  भावाच्या  मनगटावर  एक  राखी  म्हणून  एक  डोरा  बांधत  असते व  भावा  कडून  रक्षा  करण्याचे वचन घेत  असते  व  बहीण  त्याच्या  आरोग्य साठी  प्रार्थना  करत  असते. 

प्रतीकवाद आणि महत्त्व

रक्षाबंधन  हा  सण  प्रामुख्याने   ऑगस्ट  महिना  मध्ये  येत  असतो.  राक्षबांधन  हा  सण  पौर्णिमेला  साजरी केला जातो  राखी  याला   हिंदू  संस्कृती मध्ये  रक्षा  कवच  असे  देखील  मानले  जात  आहे. हिंदू  संस्कृती  मध्ये   या  सण  साठी  अनेक  कथा  प्रसिद्द  आहेत. 

  • गणेश चतुर्थी

गणेश चतुर्थी

हिंदू  धर्मामधील  भगवान  गणेश  हा  बुद्धिमान  देवता  च्या रूपा  मध्ये मानले  जाते  हा  देवाला  अनेक  आव्हाने ओळखले जाते. हा हिंदू  सण  एकूण  दहा  दिवस  साजरा  केला   जातो. यामध्ये  गणेश  चतुर्थी  या दिवशी  प्रत्येक  घरा  मध्ये  किंवा  समूहाने  बाहेर  अंगण  मध्ये  मूर्ती  स्थापन  केली  जाते  व  या  मूर्ती ची  प्राण  प्रतिष्ठा  केली जाते  व  नैवेद्य  ठेवला  जातो. 

या  नैवेद्या  मध्ये  प्रमुख  मोदक  हा  गणपतीला  आवडणारा  प्रसाद  आहे   व  रोज  सकाळी  व  संद्याकाळी  आरती  केली  जाते. असे  रोज  दहा  दिवस  केले  जाते  व दहाव्या  दिवशी  म्हणजेच  अनंत चतुर्थी  या  दिवशी  गणपती  ची  मोठ्या  आनंदाने  मिरवूनक   काढली जाते व  गणपती  पाण्या  मध्ये  विसर्जन  केले  जाते हा  उत्सव  सम्पूर्ण  भारत  मध्ये  साजरा  केला  जातो. 

 पण  विशेष  महाराष्ट्र मध्ये  खूप  उत्साने  साजरा  केला  जातो  भारता  वर  ज्या  वेळी  ब्रिटाशांचे  राज  होते  त्यावेळी  हा  सण  थोड्या  अल्प  प्रमाण  मध्ये  हा  सण  साजरा  केला  जात  होता  कारण  ब्रिशाचे  मुख्ये  हत्यार   हे  भारतीय  जाती  मध्ये  फूट पाडून  राज्य  करणे  हे  होते म्हणून  १८८३ या  रोजी  स्वातंत्र्यसैनिक  लोकमान्य  बाळ गंगाधर टिळक यांनी  हा  उत्सव  सुरु  केला  जणे  करून उत्सव  च्या  निमित्ताने लोक  एकत्र  येतील  व  इग्रंजान  विरुद्धत  लढा  देतील   

निष्कर्ष(Conclusion)

हिंदू धर्म हा जगामधील तिसऱ्या  स्थानावरील  सर्वात  मोठा धर्म 
आहे. 
हा 
धर्म 
खूप 
मोठया प्रमाणात 
मानला 
जातो याचे 
ऐकून अंदाजी एक
अब्ज अनुयायी
  आहेत. हिंदू  धर्मा  मध्ये  इतर 
धर्मा सारखा
संस्थापक
  नाही हिंदू  धर्माची उत्पत्ती हि ५००० वर्षाहून अधिक  वर्ष 
झाली आहे. या 
मुले हिंदू
धर्म हा खूप
  जुना व जटिल मानला जातो.  हिंदू 
धर्मा 
मध्ये 
अनेक 
परंपरा 
आहेत.हिंदू 
धर्मा 
मधील अनुयायी 
वर्ष 
भरामध्ये 
अनेक  हिंदू 
सण साजरे 
केले 
जातात 
त्या 
मध्ये 
मुख्ये 
सण 
म्हणजे गुढी पाडवाराम नवमी, हनुमान जयंती,
नारळी पौर्णिमा,
मंगळा गौरजन्माष्टमी, गणेशोत्सव,
कोजागिरीदिवाळी,
मकर संक्रांतीशिवरात्री आणि होळी 
या सारख्या 
 हिंदू सण चा  समावेश  आहे. हे   सर्व धर्म  धार्मिक 
आस्तेने 
साजरे 
केल्ये जातात 
पण 
प्रत्येक 
सना 
मध्ये 
काही 
तर  वैज्ञानिक कारण 
आहे 
समाज 
एकत्र 
येण्या 
साठी 
हे 
सण 
साजरे 
केले 
जात 
आहेत.हे 
सर्व 
सण 
बदल 
माहिती दिली 
आहे.

FAQ

हिंदू धर्मात किती प्रमुख सण साजरे केले जातात?

हिंदू धर्मा मध्ये अनेक प्रकारचे प्रमुख हिंदू सण हे साजरे केले जातात पण त्यामध्ये दिवाळी,होळी,दसरा,मकर संक्रांती, रक्षाबंधन, गणेश चतुर्थी, कृष्ण जन्माष्टमी, नवरात्री आणि शिवरात्री.हे प्रमुख सण आहे प्रत्येक सण हा एका वेगवेगळ्या कारणाने व वेगवेगळ्या वेळेला साजरा केला जातो.

कोणत्या हिंदू सणाला ‘दिव्यांचा उत्सव’ म्हणतात?

दिवाळी या सणाला दिव्याचा उत्सव म्हणतात करार या सणाला अंधारावर प्रकाश च व वाईटावर चांगल्याच विजय या स्वरूपा मध्ये हा सां साजरा केला जातो.

नवरात्रीत किती दिवस उत्सव साजरा केला जातो?

नवरात्री हा सण ऐकून नऊ दिवसाच्या काळा मध्ये साजरा केला जातो नऊ दिवसाचा कालावधी मध्ये प्रत्येक दिवशी दुर्गा देवी चे वेगळ रूप असते बरोबर दहाव्या दिवशी विजयादशमी या नावाने हा दिवस साजरा केला जातो जे कि वाईटावर चांगल्याचा विजय याचे प्रतीक आहे.

दिवाळीत हा सण किती दिवस साजरा केला जातो?

दिवाळी सण हिंदू संस्कृती मध्ये सगळ्यात मोठया प्रमाणात साजरा केला जाणार सण आहे दिवाळी हा सण ऐकून पाच दिवस साजरा केला जातो दिवाळीचा प्रत्येक दिवसाचे एक वेगळे महत्व आहे.

मकर संक्रांति किस विशेष घटना से जुड़ा है?

मकर संक्रांति हा सण सूर्याशी समधीत सण आहे हा सण सूर्य हा मकर राशी मध्ये प्रवेश करण्याचे एक प्रतीक आहे. या दिवसा पासून दिवस हा मोठा होतो व रात्र हि लहान होत जाते याला घटनेला हिंदू धर्मा मध्ये खूप शुभ मानले जाते

गणेश चतुर्थीचे महत्त्व काय?

परशुराम

परशुराम  

Parshuram

परशुराम  हे  भगवान  विष्णू  यांचे  साहवे  अवतार  मानले  जाते.  परशुराम  हे  भारतामधील  प्रसिद्द  सम्राट प्रसेनजीत या राज्यचे  नातू  होते  परशुराम  हे  ब्राह्मण  कुलमधील  होते  परशुराम (Parshuram) यांच्या  आई  चे  नाव  हे रेणुकामाता  होते  व  वडिलांचे  नाव  हे  ऋषी  जमदग्नी  हे  होते  ऋषी  जमदग्नी  हे  सम्राट  प्रसेनजीत  चे  जावई  होते. परशुराम यानाचा  जन्म  हा अक्षय्य  तुतियेला  रेणुकामाता  यांच्या  पोटी  झाला. परशुराम  हे एक  महान  योद्धा  व तपस्वी व  धर्मरक्षक  या  गोष्ट्यी साठी  प्राणदायी  आहे. त्याच्या  कथा  ह्या  आपल्याला  न्याय  व  धर्माच्या  पालन  करणे  धर्माचे  मार्गाने  चालणे  हे शिकवतात. 

परशुराम

परशुराम  हे  जन्माने  ब्राह्मण  असून  सुदा  त्यांच्या  मध्ये  क्षत्रियांचे   सर्व  गूण  सामावले  होते  भगवान  परशुराम  यांचे मुख्ये  शस्त्र  हे परशु  या नावाने  ओळखले  जाते  ते  ब्राह्माण  असून  सुदा  संपूर्ण  क्षत्रियांचे  गुण  हे त्यांच्या  मध्ये  होते  म्हणून  त्यांना शरादपि  किंवा शापादपि असे  म्हणले  जात  होते. परशुराम  यांनी  परशु  हे शस्त्र  भगवान शंकराकडून  तप  करून  घेतले  व त्या नंतर  तयतानी अनेक  विद्या  आत्मसात  केल्या  होत्या व या  विद्याच्या  जोरावरच  त्यांनी दुष्ट्य  व  प्रजेला  त्रास  देणाऱ्या  राज्याना  धडा  शिकवला  व  त्ये  राज्ये  जिंकून  घेतले. 

परशुराम: धर्म, न्याय और वीरता का प्रतीक 

परशुराम  यांचे  जीवन हे न्याय  आणि धर्म  साठी समर्पण  केले  होते. त्यांनी  अनेक  कार्य  केली  त्यामुळे मानस  मध्ये  साहस  व त्याग  कसा  झाला  जातो याचे  एक  उत्तम  उदाहरण  हे  परशुराम  यांचे  आहे  परशुराम  हे एक  देव  होते  ते  भगवान  विषुनु  हे  या   देवाचे  सातवे  अवतार  होते भगवान  परशुराम  यांनी  धर्माचे  पालन  करायचे  व  धर्माची रक्षा  करण्यासाठी  उभा  राहाचे  व  धर्माचा  विस्तार  करत  राहाचे  हे परशुराम  यांनी  हि  शिकवण  दिली. 

अवतार का उद्देश्य  व  शिक्षा

परशुराम  या  देवाचा  जन्म  हा  पुथ्वी  वर  असणाऱ्या  अधर्म  च्या  वाटणे  चालणाऱ्या  व अत्याचारी क्षेत्रीय  शत्रू  कि  नाश  करण्या  साठी  व  धर्म  स्थापन  करण्यासाठी  परशुराम अवतार  अवतरले. त्याचे  वडील  जमदग्नी  ऋषी यांची  हत्या  हि  एक सहस्त्रार्जुन  नावाच्या  एक राज्यांनी  केली  होती  म्हणून  या  अन्याय चा  बदला  घेण्याचा  संकल्प  घेतला त्यांनी  एकूण  २१ वेळा  क्षेत्रीय  चा  विन्यास  केला  आहे. परशुराम  यानी  त्यांच्या  वडला  पासून शास्त्राचे  न्यान  हे घेतले. भगवान  शिव  यांच्या  कडून  त्यांनी  धनुर्विद्या  आणि  युद्ध  कला  याचे  न्यान  घेतले. परशुराम  याना  एक तपस्वी  म्हणून  सुदा  ओळखतात  व  या त्याच्या  तपस्या  आणि  त्याचे समर्पण  मूळचे  त्यांना  एक  परिपूर्ण  योद्धा  बनले. 

महाभारतात  व रामायण  मध्ये  भूमिका 

महाभारत  मध्ये  कर्ण, भीष्म  आणि  दोरणाचार्य  याना  एक  महान  यौद्धा बनवण्या साठी  परशुराम  यांची  खूप  महतवाची भूमिका  आहे  परशुराम  यांनी  तीन  योद्धाना  शिक्षा  देणाचे  काम  केले  परशुराम  यांनी  या  तीन  योध्याच्या  गुरु ची  भूमिका   केली  रामायण  मध्ये  ज्या  वेळी  भगवान  राम  यानी शिव धनुष तोडला  त्यावेळी  परशुराम  यांनी   भगवान  राम  याना भगवान  म्हणून स्वीकार केल  होत.

चिरंजीव परशुराम

हिंदू  धर्मा  मधील  शास्त्र  नुसार  एकूण  सात  चिरंजीव  असे आहेत  कि  ते अमर  आहेत  त्यांचा  मूर्तीव  हा  होत  नाही व  ते  दिव्य  शक्ती  त्याच्या  जवळ आहे   हे  आज सुद्धा पुथ्वी  वर   निवास  हे करत  आहेत  या  मध्ये  परशुराम,बलि,विभीषण ,हनुमान ,महर्षी वेदव्यास , कूपाचार्ये  आणि  अश्वस्थामा हे  आहेत.  या  चिरंजीव  मधील  परशुराम  हे सगळयात  क्रोधी  सभावाचे  मानले  जात  यांनी  अर्धमी  राज्याचा  नाश  करण्यासाठी शास्त्र  हे उचले ज्यावेळी  रामायण  मध्ये   भगवान  रामा  सांग भेट  झाली  तेव्हा त्यांना  आशीर्वाद  देऊन गिरी  पर्वत  वर  तपस्या  करण्या  साठी  निगुन  गेले  परशुराम  यान  एक  न्याय  प्रिय  राजा  म्हणून  ओळखले जाते. 

FAQ:-

परशुराम कोण होते?

परशुराम हे भगवान विष्णू यांचा सहावा अवतार मानले जातात. ते एक ब्राह्मण योद्धा होते, ज्यांनी धर्म रक्षणासाठी आणि अधर्माचा नाश करण्यासाठी अनेक युद्धे लढली. त्यांचे वडील ऋषी जमदग्नी आणि आई रेणुकामाता होत्या.

परशुराम यांचे मुख्य शस्त्र कोणते होते?

परशुराम यांचे मुख्य शस्त्र परशु (कुऱ्हाड) होते. हे शस्त्र त्यांनी भगवान शिवांकडून तप करून प्राप्त केले होते. त्यामुळेच त्यांचे नाव ‘परशुराम’ ठेवले गेले.

परशुराम यांनी कोणते कार्य केले?

परशुराम यांनी २१ वेळा अधर्मी क्षेत्रीय राजांचे नाश केले आणि धर्माची स्थापना केली. त्यांनी अन्यायाविरुद्ध लढा देत आपले जीवन न्यायासाठी समर्पित केले.

आजच्या काळात परशुराम कसे स्मरण केले जातात?

आजच्या काळात परशुराम हे साहस, त्याग, आणि न्यायाचे प्रतीक मानले जातात. त्यांचे स्मरण विशेषतः अक्षय तृतीयेला केले जाते, जे त्यांच्या जन्मदिवसाचे प्रतीक आहे.

परशुरामांनी कोणाकडून शिक्षण घेतले?

परशुराम यांनी आपल्या वडिलांकडून शास्त्रांचे ज्ञान घेतले आणि भगवान शिवांकडून धनुर्विद्या आणि युद्धकलेचे शिक्षण घेतले.

परशुरामाचा अवतार घेण्यामागील उद्देश काय होता?

परशुराम यांचा अवतार घेण्याचा मुख्य उद्देश अधर्मी क्षेत्रीय राजांचा नाश करणे आणि पृथ्वीवर धर्माची पुनःस्थापना करणे हा होता. त्यांनी अत्याचारी राजांचे २१ वेळा विनाश करून न्याय प्रस्थापित केला.

परशुराम कोणत्या प्रकारच्या व्यक्तिमत्त्वाचे होते?

परशुराम हे अत्यंत क्रोधी स्वभावाचे आणि न्यायप्रिय होते. त्यांनी अधर्मी राजांचा नाश करण्यासाठी शस्त्र उचलले होते. ते एक तपस्वी, पराक्रमी आणि धर्मरक्षक योद्धा होते.

महाभारताची कथा

महाभारताची कथा

story of Mahabharata

महाभारताची  कथा  हि  संपूर्ण  द्वापरयुग  मध्ये   घडल्या  गोष्टीचा  एक  भाग  आहे. महाभारताची  कथा  म्हणजे  भगवदगीता  मध्ये  जे भगवान  कुष्ण  यांनी  जे  शोल्क  किंवा  खाई  उद्देश  दिले  आहेत  त्या  सर्व  गोष्टीचा  गुच्छ  होये. महाभारत  हे  द्वापरयुग  मध्ये  झाले  एका  भीषण  युद्धाला  दिले  नाव  आहे. हे  नाव  भगवान  कुष्ण  यांनी  ठेवले  होते  महाभारत  हि  फक्त  कथा  नसून  तो  प्राचीन  संस्कृत  भाषे  मध्ये  लहिलेला  एक  काव्येग्रंथ  सुद्धा  आहे.    

महाभारताची कथा

महाभारत  हा  काव्येग्रंथ  महर्षी  व्यास   यांनी  हि कथा  सांगतली  व  भगवान  गणेश  यांच्या  कडून  हि  हा  ग्रंथ  लिहून घेण्यात आला  हा  ग्रंथ  हा  न  थमात  जसे महर्षी  व्यास  सांगतील  तसा  हा  ग्रंथ  हा  लिखाण हि  पूर्ण  कार्याचे होते  म्हणून  महर्षी  व्यास  या  साठी  मदत मागण्यासाठी  भगवान शिव  यांच्या  कडे  गेले. 

त्यावेळी  शिव  याना  आपल्या  पुत्र गणेश  याला  तो  ग्रंथ  लहिण्यासाठी  पाठवली  व भगवन  गणेश  यांनी  हे न थमता  हे काम  पूर्ण  केले महाभारत  हिंदू  धर्मामधील  एक  प्रसिद्द  महाकाव्यग्रंथ  आहे. महाभारत  या  ग्रंथा  मध्ये   सुमारे १,१००० श्लोक  आहेत  या  ग्रंथ  मध्ये  अनेक  गोषीतेचे  वर्णन  हे केलं  आहे.

जसे  न्याय  शिक्षण  महाभारता  मध्ये वैद्यकशास्त्र, ज्योतिष, युद्धशास्त्र, योगशास्त्र, अर्थशास्त्र, वास्तुशास्त्र, शिल्पशास्त्र, कामशास्त्र, खगोलशास्त्र  व  धर्मशास्त्र   या शस्त्र  चे देखील  वर्णन  हे महाभारत  या  ग्रंथा  मध्ये  केले  आहे. 

कथासार 

महाभारत  या  कथेची  सुरवात  शांतनू  या  राज्यच्या  कारकिर्दी  मध्ये  सुरु  होते. शांतनू  हे  गुरु  वंश  मध्ये  जन्म  झाले  राजे  होते महाराज  शंतनू  यानाचा  विवाह  गंगा  या देवी  संग  झाला. पण  विवाह  पूर्ण होण्या  आधी  गंगा  यांनी  एक  शर्त ठेवली  होती. 

 गंगा  यांनी  केले  कोणती  हि काम  करण्यासाठी  शांतनू  राज्य  कोणताही  प्रश्न  हा  विचारणा नाही  व  शर्ट  शांतनू  राज्यांनी  मान्य केली  होती  शांतनू  व गंगा  याना  ८ मुले  झाले  पण  गंगा  देवी  आपल्या  प्रत्येक  मुलाला  जन्म  झाल्या  क्षणी  नदी   समर्पित  करत होती. 

यामुळे  शांतनू  या राज्याची   संयम  हा  तुटत  चला  व  ज्यावेळी  गंगा  आपल्या  ८  मुलाला  नदी  मध्ये  समर्पित  करत  असताना  शांतनू  राज्याने  गंगा  याना  विचारले  याचे  कारण  हे गंगा  यांनी  सांगतले  कि  या आठीहि  मुले हे  वासुदेवाचे  अवतार  होते  व  या आठ  मुलांना  गुरु  विशिष्ट  यांनी  त्यांची  गाय  हरण  केल्या मुले  त्यांना  श्राप मिळाला  होता. 

यामुळे  गंगा  हि  आपल्या  मुलांना  नदी  मध्ये  समर्पित  करत होते  व  हा आठवा  मूल  म्हणजे  भीष्म  पितामह  व  गंगा  देवी ने वचन  तुटल्या  कारण  मुले  देवव्रत  वाल्या  मुलाला  आपल्या सांग घेऊन  गेली  यामुळे  शांतनू  राज्य  सारखे  नदी वर  येत  व गंगा  नदी ची माफी मागत  परत  एका दिवशी  गंगा  नदी  परत आली  देवव्रत  वाल  मूल  म्हणजे  भीष्म  याना  शांतनू  राज्यांना  परत दिले.   

भगवान कृष्ण

भगवान कृष्ण

 lord krishna

भगवान  कुष्ण  हे  विष्णू  देवाचे  एक  रूप  आहे. भगवान  कुष्ण  हे  हिंदू  धर्मामधील त्रिमूर्ती देवा  पैकी  विष्णू  या  देवाचे हे  एक रूप  आहे. भगवान  कुष्ण  हे  करुणा  माया  आणि  प्रेमाचे  देव  म्हणून   मानले जाते  कुष्ण  यांचा  जन्म  हा पुराण व ग्रंथो  नुसार भाद्र  महिना  मध्ये  अष्टमी  तिथी  मध्ये  बुधवारी  मोहिनी नक्षत्र  व वृष राशि मध्ये मध्य रात्री  मध्ये  झाला. कुष्ण  यानाचा  जन्म  दिवस हा  कुष्णजन्माष्टीमी  या  नावाने  जर वर्षी  हिंदी  दिनदर्शिका  प्रमाणे  साजरा  केला  जातो.   

भगवान कृष्ण

भगवान  कुष्ण  हे  हिंदू  धर्मा  मधील  लोकप्रिय  देव  मानले  जाते. कुष्ण  यांचा  जन्म  हा  द्वापरयुग च्या  काळामध्ये  झाला होता. परत ज्या  वेळी  श्री  कुष्ण  यांचा  अवतार  समापती  म्हणजे  कुष्ण  यांचा  मूर्तीव  झाला  त्यावेळी  द्वापरयुग  चा  शेवट  झाला  व कलयुगला  सुरुवात  झाली. 

 कुष्ण यांच्या  प्रत्येक  जीवन मधील प्रत्येक  शेण  हा त्यांच्या काही  कर्तव्याशी  जुळले आहेत.  कुष्ण  या शब्दाचा  अर्थ  म्हणजे  सगळ्यांना  आकर्षित  करणारा  असा  हा होतो. कुष्ण  यानाचा  अनेक  दंत  कथा  महाकाव्ये  या  मध्ये  श्री कुष्णाचा  ओळख  हा केला आहे.  

महाभारत ,  भगवद  पूर्ण ब्रह्मवेर्त  पुराण  यासारख्या  अनेक  पुराण  मध्ये  श्री  कुष्णाचे  पात्र  हे दर्शवले  आहे. श्री  कुष्ण  याना  अनेक  उत्तम  ह्या  दिल्या  आहेत  जसे कि एक दीव मूल एक  खोडकर  मूल व एक  आदर्श  प्रेमी  आणि  बसवरी  वजवणारा  तरुण मुलगा  यासारख्या   उत्तम  या दर्शवला  आहेत.

कुष्ण  यानाची  आई  नाव देवकी  व वडिलांचे  नाव वासुदेव  मथुरेचा  राजा  कंस  हा  देवकी  याचा  भाव  होता  कंस  याला  भविष्यवाणी  केली  होती  कि   देवकीचा  पुत्र  हा  तुझा  वध  करेल  म्हणून  कंस  यांनी  देवकी  ला वासुदेवाना  कैदेत  ठेवले होते  देवकीचे  ८  पुत्र  हे  कंस यांनी मारले  होते  ज्या  वेळी  श्री  कुष्ण  चा  जन्म  झाला  त्यावेळी  वासुदेवानी  गोकुळा  मधील  मित्राला  श्री  कुष्ण  याना दिले.  

भगवान  कुष्ण  यांचे स्वरूप 

कुष्ण  यांचे  निवासस्थान  हे द्वारिका,गोकोल,मथुरा , वैकुठं  या  सारख्या  ठिकाणी  निवास्थान  आहे. श्री  कुष्ण याना  आठ  बायका  दोन  बहीण   व  ८०  पुत्र  हे होते त्याच्या  भावाचे  नाव हे  बलराम  व  सुभद्रा  व  द्रौपदी असे या दोन  बहिणी  चे  नाव  होते  द्रौपदी  हि  मानले  बहीण  होती  आणि  सुभद्रा  हि  सखी बहीण होती . 

राधा  हि  कुष्ण  ची  प्रेयसी  होती कुष्ण  याना  प्राण्याची  खूप  आवड  होती.  खासकरून  कुष्ण याना  घोडा  हा प्राणी  आवडत  होते कुष्ण  यांच्या कडे  चार  घोडे होते  पहिल्या  घोड्याच्ये  नाव  हे व त्यांची  नाव  हे  कुष्ण  यांनी  त्यांच्या  वैशिट्ये  प्रमाणे  ठेवण्यात  आली होती. 

त्यामधील  पहिल्या  घोड्याचे नाव हे शैव्य  व दुसऱ्या  घोड्याचे  नाव  हे सुग्रीव  व  तिसऱ्या  घोड्याचे  नाव  हे बालहक  आणि  चोथ्या  घोड्याचे  नाव  हे मेघपुष्प   होते. भगवान  कुष्ण  यानाचे  शस्त्र  सुदर्शन  चक्र हे होते भारतामधील महाराष्ट्र या राज्य  मधील पंढरपूर  या  ठिकाणचे विठ्ठल  हे  सूड  कुष्णाचे अवतार  आहेत. भगवान कुष्ण  यानाचे मंत्र  ओम नमो भागवते  वासुदेवाय  नमः  हे आहे.भगवान  कुष्ण  याचे  तीन  मुख्ये  तीर्थशेत्र  मथुरा वृंदावन व द्वारिका हे आहेत.    

  

   

   

   

भगवान शिव

भगवान शिव

 lord shiva 

भगवान  शिव  हे  हिंदू  देवमधील  त्रिमूर्तीमधील  एक  देव  आहेत. भगवान  शिव  याना  महादेव  असे  म्हणता. भगवान  शिव  यानाची  अनेक  रूपे  हे लोकप्रिय  आहेत. ज्या  वेळी  राक्षस  व  देवता  या दोन  जनानी  मिळून समुद्रमंथन  केले  होते  त्यावेळी  जे  विष  निघाले  होते  ते  विष  भगवान  शिव  यांनी  स्वता  घेतले  होते  व शिव यानी आपल्या गळा  मध्ये  ते विश  साठवून  ठेवले  होते  त्यामुळे  त्यानचा  गळा  हा निळा  झाला  व त्यांना  नीलकंठ  या नावानी  सुदा बोलणे  चालू  झाले.  

भगवान शिव

भगवान  शिव  यानाची  अनेक रूपे  आहेत  जसे  सर्व  प्राणिमात्र  पशुचे  स्वामी  असल्या  कारणा  मुळे  त्याना  पशुपती  या  नावाने  सुधा  ओळखतात. व जो  सुष्टी  चे  कल्याण  करतो  त्याला  शंकर असे म्हणता. तसेच  योगीश्वर  वर  हे सुधा  नाव  हे प्रसिद्द  आहे. 

रुद्र  हे  नाव  वैधांमधील  प्रिसिद्द  नाव   आहे. शिव  हे जगातील  पहिले  योगी  व  पहिले गुरु मानले  जातात. ब्रह्मदेव , भगवान  विष्णू  व भगवान  शिव  हे  तीन  त्रिमूर्तीमधील  देवाची  नाव  आहेत या मध्ये  प्रत्येक  देव हा  सुष्टी  मध्ये म्हतवाची भूमिका बाजवत असतो.  

त्यातील पहिला म्हणजे  ब्रह्मदेव  हे  सृष्टीचे  निर्माती  करणारे  देव  आहेत  ब्रहमचा  एक  दिवस  हा  पुथ्वी  वरील अनेक  लाखो  व करोडो  दिवसा  पैकी  एक  आहेत  त्या  मध्ये  चार  योगाचा  समावेश  आहे. दुसरा  देव  म्हणजे  भगवान  विष्णू  या  देवाचे काम  हे  सुष्टी  चे  पालन  करणे  हे  आहे. तिसरा  म्हणजे  भगवान शिव  यानाचे  काम  हे सुष्टी  चे  कल्याण  करणे हे  आहे.

भगवान शिव  यानाचे स्वरूप 

कुटुंब  हे  भगवान  शिव  यानाचे  खूप  मोठे  आहे  यामध्ये  भगवान शिव  याना  पार्वती नावाची  पत्नी  आहे  व दोन मुले  व एक मुलगी आहे पहिला  मुलगा  म्हणजे  शिवपुत्र  गणपती  दुसरा  मुलगा  म्हणजे  कार्तिकेय  व मुलगी यांचे नाव हे अशोक सुंदरी  शिवपुत्र  गणपती याना  दोन  पत्नी  व दोन मुले  आहेत  ऋद्धी व सिद्धी  ह्या  दोन  पत्नी  आहेत. 

शुभ  व  लाभ  हे दोन  गणपतीचे  मुलगे  आहेत. व कार्तिक  या दुसऱ्या  मुलाला दोन  पत्नी  आहेत.  देवयानी  व  वल्ली  हे  कार्तिकेय  या देवाचा  पत्नी  आहेत. भगवान शिव  यानाचा  मंत्र ओम नमः शिवाय  हा आहे. व वाहन  हे नंदी  हे आहे.

भगवान शिव  यानाचे  शस्त्र  त्रिशूल  व  निवास्थान  कैलाश  व  स्मशान  हे आहे.१२ ज्योतिर्लिंग हे भारतातील  प्रसिद्द  तीर्थक्षेत्रे आहेत  या  तीर्थक्षेत्रा मध्ये  शवलिंगाची  पुजा  हि केली  जाते. खास  करून  भगवान  शिव  यांची  मूर्ती  न पुजता  शिवलंगची  पूजा  हि केली  जाते  व  वेळपत्र  त्यांना   अर्पण केले  जाते  कारण  वेलपत्र  हे त्यांना  प्रिये  आहे. 

भगवान  शिव  याना  वैदीक  काळा  मध्ये  रुद्र  याच्या  स्वरूपात  पुजले  जात  होते  परत रामायण  काळामध्ये   फक्त  मानव  हे  देवाची  पूजा  न करता  दानव  सुदा  शिव  यांची  पोज करत  होते  व  महाभारता  मध्ये  योग  सी संबंध  असणे  ये दर्शवले  आहे  शिव  याना   महायोगी  असे म्हणले  आहे.   

जगन्नाथ मंदिर

जगन्नाथ मंदिर

jagannath temple

जगन्नाथ  मंदिर हे एक हिंदू  धर्मा  मधील  एक  प्रसिद्द  मंदिर  आहे . जगन्नाथ  मंदिर  हे  विष्णू  देवाचे  रूप  जगन्नाथ  याला समर्पित  आहे . जगन्नाथ  मंदिर(jagannath temple)  हे  भारतामधील  ओडिशा  राज्य मधील  पुरी  या  ठिकाणी  स्थित  आहे. मंदिराच्या  पुरालोक  नोंदीनुसार  हे  मंदिर  अवती  चा  राज्या  इंद्रद्युम्न  या  राज्याने  मुख्ये  मंदिर  बांधले या  मंदिराची  गणना  हि  चार  धाम  मध्ये  केली  जाते. हे  मंदिर  एक हिंदू  तीर्थक्षेत्र  आहे.  

या  मंदिराची  विशेता  हि  आहे  कि  इतर  मंदिर  मध्ये  जसे  दगड  किंवा  धातू  ची  मूर्ती  असते  पण  जगन्नाथ  मंदिर  मध्ये  लाकडाची  मूर्ती  बनवली  जाते  व  जर १२ किंवा  १९  वर्षांनी  हि  मूर्ती  रती रिवाज  प्रमाणे  बदली  जाते. 

अनेक  दंतकथा  मध्ये  असे नमुत  आहे ज्या  वेळी   श्री  कुष्णाचा  मूर्तिवं  हा  झाला तेव्हा पार्थिव   धडाला  अग्नी  दिली  त्यावेळी  हृदय हे  जसेतसे  राहिले  होते  हेच  हृदय  या मंदिर  मध्ये  स्थित  आहे.  या  मंदिर  मध्ये  प्रमुख  तीन  लाकडाच्या  मूर्तीया  आहेत  ह्या  मूर्ती  जर १२ ते  १९  वर्षी  बदलण्या   चे  हे देखील  मुख्य  कारण  आहे.

हे मंदिर  हिंदू  धर्मा  साठी  व  विशेष  वैष्णव  धर्माचे  पालन  करणाऱ्या  लोकांसाठी  खूप  पवित्र  आहे. या  मुले  वैष्णव धर्माचे  अनेक  संत  या मंदिरास जवळकी  होती . रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, निंबार्काचार्य, वल्लभाचार्य व  रामानंद  यासारखे  अनेक   वैष्णव  धर्माचे  संत  हे  या   मंदिराशी  संबधीत  होते.

जगन्नाथ  मंदिराचा  इतिहास    

१० व्या  शेतका  मध्ये  गंगा  राजवंशाचा  राजा  अनंतवर्मन चोडगंगा याने  या  मंदिराची  पूणर  बांधणी  केली  होती. त्या  राजच्या  वंशजांनी  ताम्रपटावर या  मंदिराचे  शिलालेख  हे  लिहले  आहेत. या  मंदिराला  परक्या  आक्रमणे  १८ वेळा  लुटलाचे  गेल्याचे  इतिहास  मध्ये  नमुत केले  आहे. 

या  मंदिरा  मध्ये  तीन देवाची  पूजा  हि केली  जाते त्यातील  पहिला  म्हणजे  जगन्नाथ दुसरा  म्हणजे  सुभद्रा  व तिसरा  म्हणजे बलभद्र  असे  तीन देव  या मंदिरा  मध्ये  स्थित  आहेत. मंदिराच्या  आतील  गाभाऱ्याच्या  भाग  मध्ये  सुदर्शन  चक्र  हे कोरले  आहेत. या  मंदिरामधील  मूर्तीना  ऋतूनुसार  त्यांना  वस्त्रे  हे घातले  जातात.

जगन्नाथ मंदिराचे रहस्य

या  मंदिराच्या  शिखरावर  जो  झेंडा  लावला  जातो  तो  कायम  हवेच्या  विरुद्व  दिशेला  फडकत  असतो व हा  झेंडा दररोज  बधला  जातो येथील  लोकांचे असे मत  आहे  कि  जर  हा झेंडा  बदला  नाही  तर  मंदिर १८०० वर्षा साठी  बंद  राहील . 

मंदिर  मधील  आपण  शिकर खाली उभा राहिलो  तर आपण त्या  मंदिराचा  शेवटचे  टोक हे बघू शेकत नाही  आहे  एवढे मोठ शिकर असून सुधा  या मंदिराची सावली हि जमणी वर पडत नाही हे आचर्याची गोष्ट्य आहे. या  मंदिर  वरून  कुठलाच  पक्षी हा उडत  नाही  किंवा  मंदिराच्या  शिकारावर बसत  नाही  यामुळे  विमान व हिलेकॉप्टरला  सुद्धा  या मंदिरावरून उडण्याची परवानगी नाही. 

या  मंदिराच्या  परिसरामध्ये  जो  प्रसाद केला  जातो  तो  कधीच संपत नाही जरी एक लाख पेक्षा  जास्त  जरी लोक या मंदिर मध्ये आल्ये तरी या मंदिराचा प्रसाद हा संपत नाही  हा प्रसाद  एकवार सात मातीची भांडी  ठेवून  प्रसाद  हा  बनवला  जातो. 

यामध्ये  चकित करणारी गोष्ट म्हणजे प्रसाद  हा  सातव्या  भांड्या  मधील  पहिला  व एक  नंबर  मधील  सगळ्यात  शेवटी  शिजतो हे एक  रहस्य  आहे. ह्या  मंदिर मधील जर १२ ते १९ वर्षी  मूर्ती ह्या  बदल्यात  जात  त्यावेळी  सर्व गावाची  वीज  हि खालावली  जाते.  

व  मंदिरा  मध्ये आत  येण्याची  कोणाला  सुद्धा  परवानगी  हि दिली जात नाही व मंदिराच्या  पसरा मध्ये  CRPF फोर्स  ला  राखण  करण्या साठी  ठेवण्यात येते  असे  दिखील  मानले  जाते  कि  त्या मूर्ती मध्ये  श्री कृष्णाचे  हृदय हे  ठेवले आहे.          

तिरुपती बालाजी

 तिरुपती बालाजी

 Tirupati Balaji 

तिरुपती बालाजी  मंदिर  हे  एक लोकप्रिय  पर्यटक  ठिकाण  आहे.  तिरुपती  बालाजी हे  ठिकाण  भारता  मधील आंध्र प्रदेश  या  राज्या  मध्ये  आहे. तिरुपती  बालाजी  हे भारता  मधील  लोकप्रिय हिंदू  तीर्थक्षेत्रां पैकी  एक  आहे.बालाजी  हा  विषुनु  देवाचा  अवतार  आहे.तिरुपती  हे  एक  शेराचे  नाव  आहे  त्या  गावामधील  बालाजी  म्हणून  याला तिरुपती  बालाजी  असे  म्हणतात.   

   
तिरुपती बालाजी

तिरु  या  शब्दाचा  अर्थ  हा  लक्ष्मी  हा  होतो.  व  लक्ष्मीचा  पती  म्हणजे  तिरुपती  या  ठिकाणी  बालाजी  या  विष्णू  देवाचे  अवताराचे  एक  मंदिर  आहे बालाजी  हा लक्ष्मी  देवी  चा  पती  आहे .  हे  मंदिर  तिरुपती येथे  जवळ  असल्या  डोंगरावर  स्थित  आहे. या  डोंगराला  तिरुमला  या  नावाने  ओळखले  जाते. 

तिरुमला  म्हणजे  तामिळ  किवा  तेलगू  भाषे  मध्ये  डोंगराला  मला  किवा मलई  म्हणतात  त्यामुळे  या  डोंगराला  तिरुमला  म्हणतात. हे  एक  भारत  मधील  सर्वात  श्रीमंत  मंदिर  म्हणून  ओळखले  जाते. यामुळे  येथील  विकास सुधा  खूप  वेगाने  होत आहे. 

वराह पुराण  नुसार बालाजी  या  देवाने  पद्मावतीसोबत लग्न  करण्या  साठी  कुबेर  कडून  ११. ४ दशलक्ष  सोन्याची  नाणी हि खेतली  होती  यामुळे  या कर्जाची  परत फेड  करण्यासाठी  म्हणून भारतातील  लोक  या  मंदिराला  भेट  देतात  व  पैसे  व  आपले  केस  या देवाला  अर्पण  हे करत असतात. 

तिरुपती  बालाजी  चा  इतिहास 

तिरुपती  हे मंदिर  सहाव्या  शेतका  मध्ये  पल्लव  राज्यांनी  या मंदिरच्या  विकसित  केले  होते.  ११ शेतका  मध्ये   श्रीवैष्णव  नावाचा  एक धर्म  आंध्र  प्रदेश  मधील  इतर  भाग मध्ये  पसरला आंध्र प्रदेशा  मधील श्रीकाकुलम  या  जिला  मध्ये श्रीकुरुमम  मंदिर  मध्ये  तिरुपती श्रीवैष्णवुला रक्षा  या  नावाने  एक लेख  आहे. 

मुस्लिम  शासकांना  जिझिया  देऊन  तिरुपती  बालाजी  मंदिराला  मुस्लिम  आक्रमण  पासून वाचवण्यात  आले  होते  असे  काही  पुरावे  मिळाले  आहेत  कि हे मंदिर १७ शेतका  मध्ये  विजयनगर  साम्राज्याचा  भाग होते. परत १९३२  मध्ये  हे  मंदिर  (TTd) या नावाच्या  एक  ट्रस्ट  कडे हे  मंदिर  सोपवण्यात  आले  आहे.

तिरुपती बालाजीचे रहस्य 

तिरुपती  बालाजी  हे  मंदिर  कोणी  बांधले  याचे  कोठेच  माहिती  नाही  या  मंदिराचा  नेमका  कोण  संस्थपाक  आहे  हे कोणालाच  माहती  नाही  या मंदिराला  फक्त  अनेक  राज्याच्या  द्वारये  विकसित  करण्यात  आले  आहे . या  मंदिर  मध्ये जी  मूर्ती  आहे  असे  लोक  म्हणतात. 

ज्यावेळी  या मूर्तीची  आरती  हि होत असते  त्यावेळी  ह्या  मूर्तीचा चेहरा  हा आसरा  दिसत  असतो.  व  या मूर्ती  मध्ये  लक्ष्मी देवी  ची  प्रतिमा  हि  दिसत  असते. व  असे  देखील  लोक  म्हणतात  कि  या  मंदिर  मधील  मूर्ती  तुन  समुद्र मधील  लाटांचा आवाज  हा येतो पण  या मंदिर  पासून खूप  लांब आहे. तसेच  या मूर्ती  च्या  डोक्या  वर  येक  जखम  आहे  त्याला  रोज चंदन  हे लावले  जाते.