Hero Banner

This blog brings knowledge from ancient history to cosmic facts and everything in between. There’s something new for everyone.

जेम्स वेब स्पेस टेलिस्कोप

 जेम्स वेब स्पेस टेलिस्कोप

 James Webb Space Telescope

जेम्स  वेब  स्पेस टेलिस्कोप  हे  एक  अंतराळ मध्ये  जाऊन  काम  करणारी  दुर्बीण  आहे. जेम्स वेब स्पेस टेलिस्कोप  हे  जसे  आपण  पुथ्वी  वरून  टेलेस्कोप  ने  वेगवेगळे ग्रह,तारे  बघतो  तसेच  अंतरिक्ष  मधून  दूर  असणाऱ्या  व  अस्पष्ट्ये पणे  दिसणाऱ्या वस्तुंना  आपण  पाहू  शेकतो  तसेच  आपण  त्या  वस्तू  वर  नजर  ठेऊन  आपण  त्या  ग्रह  व  त्यांचे चंद्र  ,तारा  यासारख्या  घटकाचे  संरचनेचा  आपण  अभ्यास  हा करू  शिकतो.

जेम्स वेब स्पेस टेलिस्कोप

जेम्स वेब स्पेस  टेलिस्कोप  हे  बनवण्यासाठी  अमेरिकन  संस्था  नासा (NSA) याने  दोन  वेगळ्या  देशाच्या  अंतराळ  संस्थे  ची  मदत  खेतील  ह्या  संस्था  म्हणजे  युरोपिन  अंतराळ  संस्था(ESA) व  कॅनेडीन  अंतराळ  संस्था (CSA) यानाची  मदत हि खेतली. 

हि  दुर्बीण  सुदा हबल अवकाश दुर्बीण याच्या  सारखी  चा  आहे. पण  या मध्ये  फरक हा  आहे  कि  हबल  दुर्बीण  हि  फक्त  डोळ्याने  दिसणारे  वस्तू म्हणजे  प्रकाश  असणारे  वस्तूच  फक्त  बघू  शेकते  त्यामुळे  जर  एखाद्या  ग्रह  बघत असताना  त्याचे  वायू  मंडळ  अडवाये  येत  होते. 

तसे  जेम्स  वेब  टेलिस्कोप  हे  इन्फ्रारेड  याच्या  साहायाने  वायू  मंडळाच्या  आत सुद्धा  बघू  शिकते  व  हबल  दुर्बीण  च्या  तुलनेत  चांगले एचडी  प्रतिमा  काढू शिकते.

जेम्स वेब स्पेस  टेलिस्कोप  चा  इतिहास

जेम्सह  वेब स्पेस  टेलिस्कोप  हे  २५ डिसेम्बर  २०२१  मध्ये  नासा  या  अमेरिकन  संस्थे  ने  कोरो, फ्रेंच  येथून   एरियन-५  च्या  रॉकेट   सहाय्याने  प्रेक्षपिट करण्यात  आले होते . हि  दुर्बीण  जानेवारी २०२२ मध्ये  सूर्ये  व  पुथ्वी  मधील  पॉईंट L२ पॉंईट  वर  पोहचली  या  दुर्बीण  ची पहिली  प्रतिमा ११ जुलै २०२२ रोजी  लोकांसाठी  पत्रकार  पारसीद  डावरे  प्रसिद्द  केली  हि  दुर्बीण पुथ्वी  पासून  सुमारे  १. ५ दशलक्ष  किलोमीटर  लांब अंतर  वर  आहे.

 जेम्सह  वेब स्पेस  टेलिस्कोप या दुर्बीण  मध्ये सोन्या  या  धातू  चा  मुलायम  असले व  बेरेलीमपासून  बनवले  अठरा  षटकोनी  आकाराचे  आरसे  आहेत. जे  या  दुर्बिणीला  २१ फुटाच्या  वासाची  भिंग  प्रधान  करतात  यामुळे  सुमारे २५ चोरस  मीटरचा  भाग हा  प्रकाश  संकलन  साठी वापरला  जातो.

 पहिला  या  दुर्बीनेचे  नाव  हे  TWR हे  होते  पण  परत जेम्स वेब  हा  नासा (NSA) मधील  प्रमुख  संशोधक होता  म्हणून  ह्या  संशोधकाच्या  नावावरून  या दुर्बीण ला  जेम्स वेब स्पेस टेलिस्कोप  असे  नामांतर  करण्यात  आले  आहे. 

कालावधी  

जेम्स वेब  स्पेस  टेलेस्कोप  या  मोहिमे  चा  कालावधि  हा  ऐकून  ५  वर्षा  साठी  नियोजन  केले  होते  पण  नासा  च्या संशोधकाच्या  ध्येय  हे  १० वर्षा च्या  कालावधी  साठी  होता या  दुर्बीण  ची  कक्षा  हि ऐकून ३,७४,०० किमी  ते १५,००,०० हे  एवढी  आहे.  या  दुर्बीण  ची  कक्षा  साठी  L2 पॉईंट  म्हणजे  सूर्ये  व पुथ्वी मधील  मधला पॉईंट मध्ये  जायला  लागणार  होते या  साठी  सुमारे ६ मिहन्याचा  कालावधी  हा लागला. 

उपकरणे 

या  दुर्बीण  मध्ये  मुख्ये  एकूण ५ उपकरणे  हे बसवले आहेत. पहिला  म्हणजे NIRCam Near IR Camera दुसरा  म्हणजे Near-Infrared Spectrograph तिसरा  म्हणजे MIRI Mid IR Instrument चवथा  म्हणजे Near Infrared Imager and Slitless Spectrograph व पाचवा म्हणजे FGS Fine Guidance Sensor असे हे  उपकरणे आहेत. 

व्हॉयेजर-2

 व्हॉयेजर-1

  Voyager-2

व्हॉयेजर-२  हे  एक  मानवनिर्मित  यान  आहे. व्हॉयेजर-२(Voyager-2) हे  अंतरिक्षक चा  अभ्यास  करण्यासाठी  याची निर्माती  हि केले होती. व्हॉयेजर-२ हे व्हॉयेजर-१  च्या  तुलनेत  खूप  कमी  वेगाने  प्रवास  करत  असते.व्हॉयेजर-२ चा  वेग  कमी  ठेवण्या  माग  हे  कारण  होते  कि  वेग   कमी  असल्यामुळे  प्रत्येक  ग्रहाचे  अचूक  पने अभ्यास  हा होत  असतो. 

 

व्हॉयेजर-२ चे  प्रक्षपण  हे  व्हॉयेजर-१ च्या  अगोदर  करण्यात  आले  होते. २० ऑगस्ट १९७७ रोजी  अमेरिकन  संस्था  नासा  Titan III E  या  प्रेक्षका  च्या  सहाणे  व्हॉयेजर-२ प्रक्षेपण  करण्यात  आले  होते. व्हॉयेजर-२  ची  निर्माती  हि  व्हॉयेजर-१ सारखी  केली  होती . 

 पण  त्या मध्ये  एक  कमी  म्हणजे  व्हॉयेजर-२ हे  कमी  वेगाने  प्रवास  करत  होते याचे  कारण  म्हणजे  युरनेश व नेपच्युन  या  दोन  ग्रह जवळ  पोहोचण्या  साठी  योग्य  बनवणे  यानाचा प्रवास  चालू  असताना ज्या  वेळी  शनी  ग्रह  आला  त्यावेळी   गुरुत्वाकर्षण  बळा  मुळे  यान  हे युरेनस  कर  आकर्षित  झाले  यामुळे व्हॉयेजर-२ हे  पहिले  असे यान  बनले  कि  ते युरेनस व नेपच्युन  जवळ  जाणारे  झाले. 

व्हॉयेजर-2  चा इतिहास

व्हॉयेजर-२  हे  ग्रहाचा  व  ग्रहाच्या  चंद्रा  चा  अभ्यास  करण्यासाठी  तसेच  अवकाशीय  मध्ये  किती  आकाश  गंगा  आहेत  यासाठी व्हॉयेजर-१ व  व्हॉयेजर-२  असे  दोन  यानाचे  काम  हे  सुरु  करण्यात  आले  होते . व्हॉयेजर-२ चे  प्रक्षेपण  हे  अमेरिकन  संस्था  नासा  याने २० ऑगस्ट १९७७ रोजी  करण्यात  आले होते. 

  व  त्या  नंतर  व्हॉयेजर -१ चे  प्रक्षेपण  करण्यात  आले  होते. Titan III E या  प्रक्षक  च्या  सहाणे  दोनी  यानाचे  प्रक्षेपण  करण्यात  आले  होते.  व्हॉयेजर-२  मोहीम  हि नेपच्युन  या  ग्रह  वर  पूर्ण  झाली. व्हॉयेजर-२  अजून सुद्धा  हीलीयोस्फीयर च्या  आत  मध्ये च आहे. 

 या  याना  मध्ये  सुद्धा  व्हॉयेजर -१  सारखी  च एक  सोनेरी  कलरची  एक  रेकॉर्डर  लावले  आहे. यामध्ये  पुथ्वी  वरील  जीवन  व  संस्कृती या  बदल  चे  माहिती  तसेच  पुथ्वी  वरील  वेगवेगळे  आवाज  व  चित्रकरण  केले  आहेत   जसे कि  व्हेल  माशाचे आवाज व लहान मूल  रडताना  आवाज रेकॉर्ड केले आहेत. 

 हे  यासाठी  केले  आहे कि  परग्रही  ला  जर  हे यान  मिळाले तर  या  रेकॉडर  च्या  सहाय्याने  ते  आपली माहिती  बघू  शिकतील. ५ डिसेंबर  २००६ रोजी  व्हॉयेज-२  हे  सूर्ये  पासून  ८०  खकोलिक  एकक   एवद  लांब होती  व्हॉयेजर -२  ची  गती  हि एका  वर्षां  मध्ये  ३. ३ खगोलिक  एकक  येवडी आहे.हळू हळू  व्हॉयेजर-२ चे  उपकरणे  हे बंद  केले  जातीळ 

गुरु  

व्हॉयेजर-२ हा  गुरु  ग्रहाचा  जवळ  हा  ९ जुलै  १९७९ रोजी  गेला  होता  गुरु  ग्रह  हा कमीत  कमी हा ५७००० किमी  अंतरावर  जवळ  आला होता. त्या  वेळी  गुरु  ग्रहाच्या  चंद्राचे  व  गुरु  ग्रहावर  फुटणाऱ्या  जोवाळमूखींचा  शोध हा लागला होता. युरोप चंद्रावर  वर  त्याला  केटर व मैदाने  असे  बघटण्यात  आले  आहे. 

व्हॉयेजर-1

 व्हॉयेजर 1

  voyager 1

व्हॉयेजर १ हे  अंतराळ  यान  आहे.  व्हॉयेजर १( voyager 1) हे अमेरिकन  संशोधन  संस्था  नासा (NSA) याने Titan III E या  प्रेक्षका द्वारे ५ सप्टेंबर १९७७ रोजी प्रक्षेपित करण्यात  आले होते. जे  सूर्याच्या  बाहेर  म्हणजे  आपली  आकाशगंगा  सौडून हेलिओस्फीअरच्या पलकडील असल्यतेला  सोर मंडळाचा  तसेच  अवकाशात  असले  विविध  भागाचे  संशोधन  व  संपूर्ण  पने त्या  गोष्टीचा  अभ्यास  करण्यासाठी व्हॉयेजर-१  हे  यान  पाठवण्यात आले  आहे. 

व्हॉयेजर 1

या  यानाचे  मुख्ये  मोहीम  हि  बुहस्पती  व  शनी सारख्या  ग्रहाचा  आणि  अवकाश  मध्ये  असले  बाहेरील  ग्रहांचा  व  त्याच्या  चंद्राचा  अभ्यास  करणे  हे  काम  व्हॉएजर-१ चे  आहे . पुथ्वी  या  आपल्या  ग्रहांपासून  व्हॉएजर-१  हे  १५ अरब  पेशा  लांब  अंतरावर  हे  व्हॉयेजर -१ हे  आहे. या मोहीम  मध्ये  ऐकून  दोन  यानावर  काम  करण्यात  आले  होते  ते  म्हणजे  व्हॉएजर-१ व व्हॉएजर-२.

 सूर्याच्या  बाहेरील बाजू  म्हणजे  हेलिओस्फीअरच्या याला पार  करणारा पहिल यान  बनले  आहे. २०१२ मध्ये  हे  यान  आकाशगंगा  ला सोडून अंतरतारकीय अंतरिक्ष  मध्ये  प्रवेश  केला त्या  मुले  हे  यान  आकाशगंगा  मधून  बाहेर  पडणारी  पहिली  वस्तू  बनली  आहे. 

व्हॉयेजर १  या  याना  जवळ  एक  सोनेरी  रंगाचे  रेकॉर्डर  आहे.  त्या  मध्ये  पुथ्वी  वर  असले  जीवन  व  संस्कृती यांच्या  मधील  विविधता ते  चित्रित  करण्या  साठी  लागणारे  आवाज  व  चित्र  याचा  समावेश  आहे. २०२५ या  कालावधी पर्येत  उपकरणाला  चालू  ठेवणाचे  इंधन  हे  व्हॉयेजर १ मध्ये आहे. 

व्हॉएजर-१  चा  इतिहास   

१९६० च्या  कालावधी  मध्ये   बाहेरील  ग्रहाच्या  अभ्यास  साठी ग्रॅन्ड टूरच यांनी  प्रस्ताव  मांडला  या  प्रस्ताव  मुले  नासा (NSA) या  अमेरीकीन  संस्थेने एक  मोहिमे  वर  काम  करण्यास  सुरवात  केली  पोयोनीयर १० या  अंतराळ  यानाने  एकत्रीत  केलेल  माहिती प्रमाणे  ने  अभियंतांना  गुरु  ग्रह भवती  तीव्र   किरणोत्सर्गाचा  अधिक प्रकारे  सामना  करण्यासाठी  व्हॉयेजर १  ची  रचना  करण्यासाठी  मदत  झाली  होती.

 पहिल्यांदा व्हॉयेजर १ ला  नाव हे मरिनर प्रोग्रामच्या मरिनर 11 असे ठेवण्यात  आले होते  पण बजट  कपाती  मुले शनी व गुरु  या मोहिमेला  फ्लायबायमध्ये कमी करण्यात  आले  व मरिनर ज्युपिटर-सॅटर्न प्रोब  असे  नामांतर  करण्यात  आले  पण  प्रोब  चे  रचना हि मरिनर ज्युपिटर-सॅटर्न प्रोब या  पेशा  वेगळी  दिसू  लागली  म्हणून  या मोहिमे  चे  नाव  बदलून व्हॉयेजर १ असे  ठेवण्यात  आले  होते.

फ्लायबाय म्हणजे  शनी  व  गुरु  या ग्रहाचा  जवळ  जाणे व्हॉयेजर १  हे शनी  च्या  जवळ ५ मार्च  १९७९ गेले  याचे  अंतर  हे  १२४,०० किलोमीटर  एवढे  आहे  तसेच  गुरु या  ग्रह  जवळ १२ नोव्हेंबर  १९८० रोजी  गेला  या ग्रहाचे  अंतर  हे  ६४९० किलोमीटर  एवढे आहे. 

कालावधी   

या  मोहिमे  चा  कालावधी  हा  ऐकून  ग्रहांसाठी ३ वर्ष ३ महिने  व ९ दिवसा  साठी  प्लॅनिंग  केले  होते  पण  कालावधी  या मोहिमेचा  ४६ वर्ष  ९ महिने  ३ दिवसा  साठी  एकूण  प्लॅनींग केला  होता इंटरस्टेलर मोहीम  हि  एकूण  ४३ वर्ष  ५ महिने  २ दिवसा  साठी  निवोजे केले  होते. व अजून देखील हि मोहीम  चालू आहे. 

अंतराळ विज्ञान

 अंतराळ विज्ञान

  space science

अंतराळ  विज्ञान म्हणजे  पुथ्वी  सोडून  ब्रम्हांड  हे अनंत  अंतरा  पर्येंत  पसरले आहे. या ब्रम्हांडा मध्ये असणाऱ्या  अनेक गोष्टीच्या शोध घेणे याला अंतराळ विज्ञान(space science) असे म्हणतात.तसेच  पुथ्वी सारखे  इतर  ग्रहा  सारखा दुसरा ग्रह  हा पुथ्वी  वर आहे का  या  गोष्टीचा  शोध  घेणे  तसेच  अंतराळ  मध्ये  असणाऱ्या ग्रहाचा हालचालीवर  लक्ष ठेवणे  या सारखे  काम हे अंतराळ  विज्ञानाचे असते. 

 

अंतराळ विज्ञाना  मध्ये  खगोलशास्त्र,ग्रहशास्त्र,ब्रह्मांडविज्ञान,जीवविज्ञान  या मुख्ये  भागणाचा  समावेश  हा  आहे  खोगलशास्त्र  या  भाग मध्ये  पुथ्वी  वरूनच  दुर्बीण व अणे  साहित्येच्या सहाय्याने  अंतराळ  चे  वस्तू  चा  अभ्यास  हा केला जातो.

 ग्रहशास्त्र या  भाग  मध्ये  अंतराळ  मध्ये  असणाऱ्या  ग्रहांच्या  संरचनेचा  व त्याच्या  चंद्रा  अभ्यास  हा केला जातो.ब्रह्मांडविज्ञान या भाग  मध्ये  ब्रम्हांडाची  निर्माती  हि कशी  झाली  या गोष्टीचा  अभ्यास  हा केला जातो. जीवविज्ञान  मध्ये  पुथ्वी  सोडून  इतर  ग्रहावर  व  ग्रहाच्या  चंद्रावर  जीवना  आहे का  नाही  याचा  शोध  घेणे. 

खगोलशास्त्र(Astronomy )

खगोलशास्त्र  म्हणजे  दुर्बीण  व  अन्य  साधनाचा  वापर  करून  ग्रहाचे  धूमकेतू  चे  निरक्षण  करणे  म्हणजेच  प्रेक्षणीय खगोलशास्त्र  होय  खगोलशास्त्र  हे  खूप  जुने  आहे  याचा  वापर  हा  भारता  मध्ये  जोतिषी  शास्त्र  या  घटक  मध्ये  होत  असे  गणित  मध्ये  असणाऱ्या  मॉडेल्स  व सिम्युलेशन्सचा वापर  करून  खगोलिक  घटनेचा  अभ्यास  करणे  तसेच  त्या  घटनेचे  वेळ  काढेन  हे दिखील  खकोलशास्त्र  मध्येच समावेश आहे.  अवकाशा  मध्ये  असणाऱ्या  विविध  वस्तूच्या  भोतिक गुणधर्मनचा अभ्यास  करणे  याला  अंतरिक्ष भौतिकशास्त्र  असे  म्हणतात.

ग्रहशास्त्र(Planetary Science)

 अंतराळ  मध्ये  असणाऱ्या  ग्रहाच्या  संरचनेचा  व  ग्रहांच्या चंद्रा  याचा  सखोल  अभ्यास  करणे  तसेच  ग्रहांच्या  गतीचा  व वातावरणाचा  सखोल  अभ्यास  करणे तसेच  पुथ्वी  सुडून  बाहेरील  अज्ञान  ग्रहांचा  अभ्यास  करणे  व त्या  ग्रहणाचा  वातावरणाचा  अभ्यास  करणे  व  त्या  ग्रहांच्या  गतीचा  व  गुरुत्वाकर्षण  शक्तीचा  अभ्यास  करणे  यालाच  ग्रहशास्त्र  असे  म्हणतात. विशेष  सूर्यमालेतील  त्याच्या  निर्मती  हा कशी  झाली  याचा  अभ्यास  करणे  हे देखील  ग्रहशास्त्र मधेच  समावेश  आहे. 

ब्रह्मांडविज्ञान(Cosmology)

ब्रह्मांडविज्ञान  या  मध्ये  ब्रह्मांडाच्या उत्पत्ती  कशी  झाली  ब्रह्माण्ड  बनले  कसे  तसेच  ब्राह्म्णदाची  विकसित  कसे  झाले  याबद्दल  माहिती  देत  असते.  भविष्या  मध्ये  येणाऱ्या  अडचणी  ह्या  पहिलाच  सांगणे  ब्रह्माण्ड  हे  बनले  कसे  ब्रह्मांड  बिग  बँग  थेरी  मुले  बनले  हे  ब्रह्मांडविज्ञान  च्या  सहाय्याने  संशोधकांनी  स्पष्ट्य  केले  आहे  बिग  बंग  थेरी  हि  मोठ्या  स्फोटकाला  दर्शवते  जे कि  ब्राह्मण  बाण्याचे  कारण  असू  शेकतये  ब्रह्मानाडा  मध्ये  पहिल्यांदा  तारे  बनले  असावाये  असा  अंदाज  आहे. 

जीवविज्ञान(Astrobiology)

पुथ्वी  सोडून  इतर  ग्रहावर  वर  व  ग्रहांच्या  चंद्रावर   जीवनाची शेकता   आहे  कि  नाही  याचा  शोध  घेणे  यालाच जीवनविज्ञान  असे   म्हणतात. पुथ्वी  वर  जे  जीवन  आहे  त्याचा  सखोल अभ्यास  करून  एकदम  हलकी  मध्ये  जगणाऱ्या  जीव  हे  दुसऱ्या  ग्राह्यावर  आहेत  कि नाही हे तपासणे  हलाकी मध्ये  जगणे  म्हणजे  समुद्रा  मध्ये  खूप  खोल  असले जीव  हे  जीव  फक्त  समुद्रा  मध्ये  खोल असता  अशी  शेकता  दुसऱ्या  ग्रहावर  तुलना  करून  बघणे हा  सुद्धा  जीवनविज्ञानाचा  भाग  आहे. 

पृथ्वी आणि अंतरिक्ष विज्ञान (Earth and Space Science) 

पुथ्वी  वर  उपग्रहाचा  वापर  करून  पुथ्वी  वर  निरक्षण करणे   तसेच  पुथ्वीच्या  वातावरणाचे  व  हवामानाचा  डेटा गोळा करणे  व  सोर  क्रियालापाचा  अंतरिक्ष  मध्ये  व  पुथ्वी च्या  चुंबिक  वातवरण  मध्ये  होणारे  बदल  याला  पुथ्वी  आणि अंतरिक्ष  विज्ञान  म्हणतात. 

 

 

     

 

चांद्रयान-3

चांद्रयान-3 

chandrayaan-3

चांद्रयान-३  हि  मोहीम  भारतातील  अवकाश  संशोधन  संस्था  इस्रो  या संस्थे ची  चंद्रावरील  तिसरी  मोहीम  आहे.ज्या  वेळी  चांद्रयान -२ या मोहिमेला  अपयश आल्या  मुले  हि  मोहीम  आखण्यात  आली चांद्रयान-३ या मोहिमे  मध्ये  सुद्धा चांद्रयान -२ सारखेच दोन  मुख्ये  भाग  म्हणून  लँडर आणि  रोव्हर  आहे   ऑर्बिटर हा भाग   म्हणजेच कम्युनिकेशन, फोटो काढणे व सकॅनिंग  या सारखे अनेक  काम हे ऑर्बिटर  करत असते पण ऑर्बिटर या भागाचा  चांद्रयान-३ मध्ये याचा समावेश  नाही. 

याच्या  बदलात  प्रोपल्शन मॉड्यूल होते  हे एका  कम्युनिकेशन रिले  सैटेलाइट सारखे  काम  केले . ऑर्बिटर  चे  काम  हे  जे  चांद्रयान-२ मध्ये जे ऑर्बिटर  पाठवले  होते   ते  चांगल्या  स्थिती मध्ये  होते  त्यांनीच  चांद्रयान-३ ऑर्बिटर  म्हणून  काम केले  होते.  २२ जुलै २०१९ मध्ये  चांद्रयान-२ हि  मोहीम  प्रक्षेपन  केले  होते.  

पण चांद्रयान-२ हि मोहीम  ६ सप्टेंबरला  लँडेर आणि  रोव्हर  चंद्राच्या  दक्षिण  द्रुवा  वर  लँड  होण्या  अगदोरच  यानाशी  सपंर्क  तुटला  व  हि मोहीम  अपयशी  झाली यामुळेच इस्रो  ने चांद्रयान-३ हि  मोहीम  हाती घेतली  चांद्रयान-३  चे  प्रक्षेपण १४ जुलै २०२३ रोजी  भारतीय  वेळेनुसार दुपारी २ वाजून ३५ मिनीटांनी झाले  पहिला  टप्याचा  भाग म्हणजे  पुथ्वी  च्या १०० किमी  गोलाकार  ध्रुवीय कक्ष मध्ये कक्षा स्थापन करणे  यशीसवि पणे  पूर्ण  झाले. 

चांद्रयान-३ चा इतिहास

चांद्रयान-३ साठी ऐकून खर्च हा भारतीय रुपये  ६१५ कोटी  एवढे आहे. आंध्र प्रदेश येथील  श्रेहरीकोटा  सतीश  धवन  अंतराळ  केंद्रातून  १४ जुलै २०२३ रोजी  दुपारी  २ वाजून ३५ मिनीटांनी  या  भारतीय  वेळेनुसार LVM3-M4  या  प्रक्षेकच्या  सहायाने चांद्रयान  चे  प्रक्षेपण पूर्ण झाले

 हे  प्रेक्षपण  झाल्या  नंतर  १६  मिनीटांनी  चांद्रयान-३ हे  यान  पुथ्वी  च्या  कक्षे  मध्ये स्थापन झाले  होते. ज्या  वेळी  या यानाचे  प्रक्षपण झाले  त्या वेळी  त्याचे  वजन हे ३९०० किलोग्रॅम  होते. २३ ऑगस्ट  २०२३ ते  २४ ऑगस्ट २०२३ या  कालावधी  मध्ये  चांद्रयान-३ चे चंद्रा वर  स्पॉट  लँडिंग  होण्याचे नियोजन  केले होते  

जर  काही  तांत्रिक अडचण अली तर  हि मोहीम २७ ऑगस्ट २०२३  ला  करण्याची योजले होते पण  संशोधक च्या अतूट कामाने  हि मोहीम २३ ऑगस्ट २०२३ रोजी भारतीय वेळेनुसार  ०६ वाजून ४ मिनीटांनी चंद्रा  च्या  दक्षिण ध्रुवावर अचुक पणे  उतरले  १४ दिवस रोव्हर ने अचूक  पणे चंद्रा वर काम  केले  त्या मुले हि मोहीम यशिस्वी  पणे पूर्ण झाली. 

चांद्रयान-३ साठी  जुलै महिना  निवडणे  ह्या  मध्ये सुदा  एक नियोजन  होते  जुलै महिना  असा असतो  कि  त्या वेळी  चंद्र हा  पुथ्वीच्या  जवळ येतो  यामुळे  चांद्रयान-२ साठी  व चांद्रयान-३ साठी  जुलै महिना हा  निवडला होता यामुळे  इंधनाचे  बचत होते  व  मोहीम  पूर्ण  करणे हे सोपे जाते      

कालावधी 

चांद्रयान-३ चा  कालावधी हा १० महिने  २० दिवस  होता. प्रोपल्शन मॉड्यूल हे  ३ ते ६ महिना साठी  नियोजन  केले होते पण  प्रॉपल्शन मोड्यूल ने  एकूण ९ महिने  २९ दिवस एवढे काम केले  विक्रम लँडर  हे चंद्रा  वर  पोहोचल्या  नंतर १४ दिवसा साठी  नियोजन  केले  होते १२ ते १३ दिवसानि च याना स्लीप मॉड  मध्ये  टाकण्यात आले होते. याचे  कारण म्हणजे  चंद्रावर  एक दिवस हा १५ दिवसाचा  असतो व रात्र हि १५ दिवसाची  रात्र ज्या वेळी  चंद्रा वर असते  त्या  वेळी  तापमान -२०० डिग्री  जवळ जाते. 

 या मुले  चांद्रयानाची  उपकरणे  काम करणे शेकय न्हवते तसेच रात्र असल्या मुले सोलार  ला  सूर्याची  किरणे  मिळत  नव्हती  त्यामुळे बॅटरी चार्जिंग  होणे अश्वक्य होते  यामुळे  विक्रम  लँडर नंतर  प्रज्ञान  रोव्हर ला सूडा  स्लीप मॉड मध्ये टाकले. प्रज्ञान  रोव्हर  कालावधी  सुदा  १४ दिवसाचं  होता  पण त्यांना फक्त ११ ते १२ दिवसा नंतर स्लीप मॉड मध्ये टाकण्यात आले. 

वजन 

चांद्रयान-३ चे  ऐकून  वजन  म्हणजे  ज्या वेळी चांद्रयान  चे  प्रक्षेपण होणार होते  त्या वेळी  त्या भागाचे वजन हे ३९०० किलोग्रॅम एवढे होते त्या मध्ये मग प्रोपल्शन मॉड्यूल चे वजन हे २१४८ किलोग्रॅम एवढे होते व विक्रम लँडर चे वजन हे १७२६ किलोग्रॅम एवढे होते  व प्रज्ञान रोव्हर चे वजन हे २६ ते २७ किलोग्रॅम एवढे होते. 

हे  पण  बघा 

भारताची  चांद्रवरील  पहिली  मोहीम  ज्यामुळे  भारत  हा  चंद्रा  वर  धोज  पोहचवणारा  देश  बनला 

चांद्रयान-2

 चांद्रयान-2

 chandrayaan-2

चांद्रयान-२ हि  मोहीम चांद्रयान-१ मोहीम  यशस्वी  पणे  पूर्ण  झाल्यावर नंतरची  दुसरी  मोहीम  म्हणजे  चांद्रयान-२  असे  म्हणतात.  २२ जुलै २०१९ रोजी भारतीय  प्रमाण  वेळेनुसार  दुपारी  २ वाजून  ४३  मिनटानी GSLV MK 3  प्रेषेक  च्या साहाय्याने  चांद्रयान-२( chandrayaan-2) चे सामान्य  प्रक्षेपण  झाले या  यानात  प्रमुख  तीन  भाग होते  पहिला  म्हणजे  कक्षाभ्रमर (Orbiter) ऑर्बिटर  हा चंद्राच्या  विशिष्ट्य  कक्षे  मधून फिरत  असतो  व  सकॅनिंग  फोटो  काढणे  व संपर्क  बनवाचे  काम  हे  ऑर्बिटर  करत  असतो.

 
चांद्रयान-2

दुसरा  म्हणजे लँडर (lander) लँडर  हा चंद्रावर  उतरण्या  साठी  त्याचा  उपयोग  हा  होत  असतो  तसेच  ऑर्बिट  शी संपर्क  बनवून  पुथ्वी  संपर्क  करणे  हे  सुद्धा  लँडरच  काम  करते. तिसरा  भाग  म्हणजे रोव्हर (rover) रोव्हर  हा  भागाचे  काम  हे  सगळ्यात  शेवते असते  ज्या  वेळी  लँडर  चंद्रा  वर  उतरत  त्यावेळी  रोव्हर  हा  बाहेर  पडतो  रोव्हर  हा  एक  प्रज्ञान बग्गी   आहे. हि प्रज्ञान बग्गी  चंद्रा  वर  फिरून  माहिती  गोळा  करून  लँडर सी  संपर्क  करून  माहिती हि  पुथ्वी   पोहोचवत  असते  हे  तिनी  हि  भाग  हे  भारताच बनवले  आहेत. 

चांद्रयान-2 चा इतिहास

१२ नोव्हेंबर  २००७ या  वर्षी  भारताची संस्था  इस्रोने  व  रशियन संस्था  रॉसकॉसमॉस  यांनी  एकत्र  काम  करण्याचे  ठरवले  ती  मोहीम  म्हणजे  चांद्रयान-२ या  करार  मध्ये  इस्रोने ह्या  भारतीय  संस्थेने  कक्षाभ्रमर रोअर व  रसियन  संस्था रॉसकॉसमॉस  यांनी  लँडर  बनवून  देण्याची  मुख्य  जबादारी  घेतली  होती. 

 परत १८ सप्टेंबर २००८ रोजी   पंतप्रधान  मनमोहन सिंग यांच्या अध्यक्षतेखाली झालेल्या  बैठेकी  मध्ये  या  मोहिम  ला  मंजुरी  देण्यात  आली होती व ऑगस्ट  २००९ मध्ये  दोनी  संस्थेने  या  चंद्रयान-२ या  मोहिम चा  आराखडा  बनवला व  इस्रोने या भारतीय  संस्थेने  या मोहिमे  च्या  भागांचे  एक  वेळापत्रक  बनवले व ते घोषित  केले होते. 

 मात्र  हि  मोहीम जानेवारी  २०१३  पर्येंत  स्थगित  देण्यात  अली व २०१६ ला  करण्याचे  ठरवले  याचे कारण  म्हणजे  रशियन  संस्थे  ला  लँडर वेळेत  बनवणे  शक्य  न्हवते  परत  २०१६ च्या  मोहिमे  ला सुद्धा  रशियन  संस्थे  लँडर वेळेत  पूर्ण  झाला  नाही  म्हणून  भारतीय  संस्था इस्रो यांनी  हि  मोहीम  स्वतंत्रपणे  पूर्ण  करण्याचे  ठरवले. 

  २२ जुलै २०१९ रोजी भारतीय  प्रमाण  वेळेनुसार  दुपारी  २ वाजून  ४३  मिनटानी GSLV MK 3  प्रेषेक  च्या साहाय्याने  चांद्रयान-२ चे सामान्य  प्रक्षेपण  झाले   भारताचे  अवकाशी  कार्क्रम चे  जंक डॉ. विक्रम  साराभाई  यानाच्या  नावाने  लँडर  विक्रम  हे  नाव  देण्यात  आले. 

७ सप्टेंबर २०१९ रोजी भारतीय  प्रमाण  वेळेनुसार १ वाजून ५२  वाजता  हे  चंद्रयान-२ हे यान  उतरत असताना केवळ २१०० मीटर  राहिले  असताना  यानाचा  संपर्क  हा  तुटला  व  चांद्रयान-२ हे  मोहीम  भारताची अपयशी  झाली  चांद्रयान-२ अपयशी  होण्या  मागचे  कारण  म्हणजे  सॉफ्टवेअर त्रुटी हे  होते.

कालावधी 

चांद्रयान-२ हि मोहीम  पूर्ण करण्या  साठी  २ मीहेण्याचा  कालावधी  लागणार  होता  त्या मध्ये   पुथ्वी  पासून  चंद्रा  वर जाणे  परत  प्रज्ञान बग्गी  १४  दिवस  चंद्रा  वर  माहिती  गोळा करण्या साठी फिरणे अस्या  गोष्टी  चा  समावेश  होता. या  मुले  चंद्रा वर  पोहोचल्या  नंतर  फक्त  १४ दिवसाचे  काम होते. या  मधील  ऑर्बिटर  हा  ४ ते ५ वर्ष  नियोजित  केला  होता  पण  या   मोहीम  अपयशी  ठरली  या  मुले  प्रज्ञान बग्गी   व  लँडर  हे  १४ दिवस  काम  करू  शेकले  नाहीत  पण  ऑर्बिटर  हा कार्यरत  झाला. 

वजन 

चांद्रयान-२ चे  वजन  हे सगळे भाग  एकत्र  मिळून ३८५०किलिग्रॅम  एवढे  होते  . ज्या वेळी  यान  हे पुथ्वी  चे   कक्षाभ्रमन  करत  होते  त्यावेळी  त्याचे  वजन हे २३७९ किलोग्रॅम  एवढे होते  ज्या वेळी  यान  चंद्र वर  पोहोचले  त्या  वेळी त्या  यानाचे वजन  हे कमी कमी होत गेले विक्रम  लँडेर चे वजन  हे १४७१ किलोग्रॅम  एवढे  होते  व  प्रज्ञान  रोव्हर  मात्र  २७  किलोग्रॅम  चे होते. 

चांद्रयान-1: ISRO ची पहिली चंद्र मोहिम आणि तिचा ऐतिहासिक प्रवास

चांद्रयान-1: ISRO ची पहिली चंद्र मोहिम आणि तिचा ऐतिहासिक प्रवास

Chandrayaan-1: ISRO’s first lunar mission and its historic journey

चांद्रयान-१ हे  भारतातील  अंतराळ  संशोधन  संस्था  इसरो  ची  पहिली  मोहीम  होती .चांद्रयान-१ या  मोहीम  मुले  च  भारत  हा  चंद्रा  वर  प्रदक्षिणा मारणारा व  आपला  ध्वज  चंद्र  वर  पोहोचवणारा  चोथा  देश  बनला  आहे. चांद्रयान-१(chandrayaan-1) हे  मानवरहित  अंतरिक्षयान   होते  याचे  प्रमुख  दोन  प्रकार  होते

पहिला  म्हणजे चंद्राला  प्रदक्षिणा  मारणार  व दुसरा  म्हणजे  चन्द्र  वर  हार्ड  लँडींग  करणारा  म्हणजे  च  एक घनाकृती प्रोब जी  कि  चंद्रा चा  पुष्ट  भागावर जाऊन  आढळणार  या  मुले  चंद्रा  च्या  पुष्ट  भागाची  माहिती  मिळले  असे  भाग  होते.  

चांद्रयान-1 मिशनचा प्रवास

ऑक्टोबर  २२ इ .स. २००८  या  दवशी  पी.एस.एल.व्ही.-सी११  या  रॉकेट  च्या  सहाणे चंद्रयान-१ या  यानाचे  प्रक्षेपण  श्रीहरीकोटा  येथील  सतीश  धवन  अंतराळ  केंद्रावरून  झाले. ८ नोव्हेंबर  २००८या रोजी  चांद्रयान-१  या  यानाला  चंद्राच्या  कक्षेत  टाकण्यात  आले  होते

परत  १४ नोव्हेंबर  २००८ या  रोजी  रात्री  यानाला  जोडलेला  मून इम्पॅक्ट  प्रोब  हा रात्री  ८ वाजून ६  मी   हा  प्रोब  प्रदक्षिणा मारणारा याना  पासून  वेगळा  केला  यामुळे  हा  भाग  वेगाने  चंद्राच्या  पुष्ट  भाग  वर  २५  मिनटानी  आढळा. 

चांद्रयान-१ चा इतिहास

चांद्रयान-१ हे  २२ ऑक्टोबर  इ . स. २००८  रोजी  पी.एस.एल.व्ही.-सी११  हे प्रक्षेपित  यानाला  घेऊन  श्रीहरीकोटा  येथील सतीश धवन  अंतराळ  केंद्रावरून  चंद्राकडे प्रक्षेपण  झाले. हे  प्रक्षेपण एकूण  चार  टपाचे  होते  यानाला  चंद्राच्या  कक्षेत  पोहोचण्या  साठी  १५  दिवसाचा  कालावधी  लागला  

 २२ ऑक्टोबर  ला   यानाला  पुथ्वी  च्या  कक्षेत  नेहून  सोडले  पण  यान  चंद्र  पर्येत जाण्यासाठी  अनेक कक्षा विस्ताराचे टप्पे  करण्यात  आले.

पहिला  टप्पा  हा २३  ऑक्टोबरला  भारतीय  वेळनुसार  नऊ  वाजता पूर्ण  करण्यात  आले या  टप्यासाठी  एकूण १८ मिनिटांसाठी  इंजन  फायर  करण्यात  आले  होते. दुसरा  टप्प  हा २५ ऑक्टोबर  ला  भारतीय  वेळयेनुसार  सकाळी ५ वाजून ४८ मी  पूर्ण  करण्यात आला  या टप्या  साठी इंजन १६ मिनिटांसाठी फायर  करण्यात  आले होते. असे अनेक  टप्पे  करण्यात  आले  शेवटचा  टप्पा  म्हणजे  पाचवा  टप्पा. 

पाचवा  टप्पा  हा ४ नोव्हेंबर  ला   भारतीयवेळेनुसार  सकाळी  ४ वाजून  ५६ मिनिटानी  पूर्ण  करण्यात  आला या  टप्या  साठी  ऐकून अडीच मिनिटांसाठी  इजान  हे चालू  करण्यात आल्ये होते  या टप्या  नंतर  यानाने  चंद्राच्या  कक्षेमध्ये  प्रहवसे  झाला  व परत कक्षा विस्ताराचे टप्पे  कमी  करण्याचे  कामास  सुरवात  झाली. अंतिम  कक्षा  कमी  हि नोव्हेंबर १२ रोजी  करण्यात  आली १४नोव्हेंबर  ला मून इम्पॅक्ट  प्रोब  ला  चंद्र च्या दिशेने  सोडण्यात  आले.     

वजन  

चांद्रयान-१ या  यानाचे  वजन  हे प्रक्षेपण  करण्याच्या  वेळी  १३८० किलोग्रॅम होते. व  चांद्रयान-१ ज्या  वेळी  चंद्रा  च्या  कक्षेत  जाते  त्या  वेळी  त्या  यानाचे वजन  हे ६७५ किलोग्रॅम  एवढे  होते.  पण  परत  ज्या  वेळी  चंद्रा  च्या  शेवट च्या  कक्षेत  याना  मधून  मून इम्पॅक्ट  प्रॉप  वेगळे होते  त्यावेळी  यानाचे  वजन  फक्त ५२३ किलोग्रॅम  एवढे  राहते. 
 
चांद्रयान-1 मिशनचा प्रवास
चांद्रयान-१`