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हूवर धरण

हूवर धरण काय आहे

What is the Hoover Dam

हूवर  नावाचे  हे  एक मोठे  धरण  आहे.  याला  हूवर  धरण(hoover dam) असे  म्हणतात  हे  धरण  अमेरिका  मध्ये  आहे. हे  मुख्येतू नव्होडा  व  अ‍ॅरिझोना या  राज्य  मधून  वाहणारी   कॉलोराडो नदीवर बांधले हे  एक  धरण  आहे. हूवर धरणाचे  रचना अभियंता चे  नाव  हे जॉन सैवेज  हे  आहेत  यांनी  या  डाँ ची  सम्पूर्ण रचना  हि  केली  आहे. 

हूवर धरण

हूवर  धरणाचे  क्षेत्रफ़ळ  हे  एकूण ६४० वर्ग  मीटर  एवढे  आहे  कॉलोराडो  नदी  चा  प्रहवा  हा अडवून  या  धरणाची  निर्मिती  हि  करण्यात  अली  या  धरणाचे  काम  करण्या साठी  नदी  चा  प्रवाह  हा  बदलण्यात  आला  होता  या  नदी  मध्ये  ४  बोगदे  पाडून  या  नदी  चा  प्रवाह  बदला  होता. व  बांधकाम  साठी  जमीन  मोकळी  सोडली  होती. 

हूवर धरणाचा इतिहास

या धरण  बांधण्या  मध्ये  मुख्य  हेतू  म्हणजे  अमेरिकी  मधील  दुष्काळी  व  वाळवंटी भाग  मध्ये  पाणी  पोहोचवणे व विजनिर्मीती  करण्या  साठी हे धरण बांधले १९३१  मध्ये  हूवर  या धरणाचे  बांधकाम  हे  सूर  झाले. व  १९३६  मध्ये  या  धरणाचे  बांधकाम  हे पूर्ण  झाले  ३० सप्टेंबर  १९३६  मध्ये  या  धरणाचे  उद्‍घाटन  करण्यात  आले. या धरणाचे बांधकाम  खर्च  हा सुमारे  अमेरिकन $४९ दशलक्ष  एवढे  होते 

या  धरणाचे  बांधकाम  हे  १०००  कामगारांनी  च्या  अतूट  महेनतीने  पूर्ण  झाले  हे  बांधकाम  पूर्ण  करताना  १००  कामगाराना  आपला  जीव  गमवा  लागला होता .  त्या  वेळी  चे   राष्ट्राध्यक्ष हर्बट  हूवर  यांच्या  नावा  मुले  या  धरणाला  हूवर  धरण असे संबोधले पण  या  धरणाचे  नाव पुढे  हेच  पढले. 

हूवर  धरण  हे ३७९ लांबी  व  २२१. ४ मीटर  व उंची  आहे. या  धरणाच्या  माघे  मिड नावाचे  एक तळे  आहे हे तळ  खूप  मोठे  आहे  तळे  कदाचित  हूवर धरण  मुले  बनले  असावे या तळाचे  क्षेत्रफ़ळ  हे ६०३ एवढे  आहे.

हूवर धरणाचे  बांधकाम  

हूवर धरण  बांधण्या  साठी  सगळ्यात मोठी  गोष्ट म्हणजे   बांधकाम  करण्यासाठी  जमीन  सुखी  ठेवणे  कारण  अभियंत  थेट  कॉलोराडो  नदी सारख्या  मोठ्या  नदी  मध्ये  बांधकाम  करू  शेकत  नाही  त्यासाठी एकमात्र  मार्ग  म्हणजे  नदी मध्ये    वळणारा  बोगदा  निर्माण  करणे   नदी  वळवण्या  साठी  ऐकून  चार  बोगदे  पाडण्यात  आले हे बोगदे  पाढण्या  साठी जंबो  ड्रिल  चा  उपयोग  करण्यात  आला  हि  ड्रिल  खास  करून  ह्या   बोधगया  साठी  तयार  करण्यात  आली  होती  जंबो  ड्रिल  च्या सहाय्याने  डायनॅमिती  साठी  होले  पाधली  जात होती. 

व  डायनॅमिती  च्या  सहाणे  एक  ठराविक  अंतर  वर जाऊन  विस्फोट  केला  जायचा  व  यामधून  दगड  कोठे व बारीक चुरा   बाहेर  काढून  त्या  बोगढचे  काँक्रीटीकरण  केले  जायचे   व  या  पदतीने  सारख सारखं करून  तबल १८  महिन्याचा  कालावधी  हे बोघडे  पूर्ण  करण्या साठी  लागत  होते  हे  पूर्ण  करून  जो  बोगद्याच्या  प्रारंभ  बिदू  होता  त्या  ठिकणी  बोगदा  निर्माण  करत  असताना  निघालेले  दगड कोठे  व बारीक चुरा  त्या  ठिकाणी  टाकला  यालाच  कॉपर डॅम  असे  म्हणतात असे  कॉपर  डॅम  शेवट  च्या  बिंदू  सुद्धा  बनवण्यात  आला  यामुळे  नदी  चा  प्रभाव  हा  वळवण्यात  यश  आले  व  बांधकाम  साठी  सुकी  जमीन  मिळाली.

 हूवर  धरण  बनवण्या साठी  सुकिया  जमनी  वरील  जागा  मजबूट  होण्या साठी  ढीले  दगड  काढण्यात  आले  व  पाण्याचे  दाब  कमी  करण्या साठी  अर्ध्या वर्तुळ आकाराचे बांधकाम  करण्याचे  ठरवले  या  साठी  धरणाच्या  रचणे  प्रमाणे  त्या  नदीच्या  भितींना  विस्फोट  करून  आकार  देण्यात  आला  व  थोडे  थोडे  बॉक्स   बॉक्स  धरणाचे  बांधकाम  हे  कॉक्रिटरीकरण  करण्यात  थोडे थोडे  बॉक्स  बॉक्स  करण्याचे  कारण  म्हणजे  काँक्रीट  चे  तापमान  मापात  राहण्या  साठी  जर तापमान  अति  गरम  झाले तर  त्या  बांधकाम  मध्ये  भेगा  पडू शिकतात असे  या  धरणाचे  बांधकाम  हे पूर्ण  करण्यात  आले. 

हूवर धरणा  मध्ये वीज निर्मिती कशी केली जाते

हूवर  धरण  मध्ये वीजनिर्मिती  करण्यासाठी  इंग्लिश  मध्ये  U आकाराचे  अक्षराची  रचने  मध्ये  करण्यात  आल्ये आहे  या  U आकाराचे  अक्षराची  रचने मध्ये  जनरेटर  बसवण्यात  आले आहेत. या U आकाराचे  अक्षराची  रचना  ऐकून  २०० मीटर  एवढी  आहे.  ऐकून  या  रचणे  मध्ये  १७ जनरेटर व टरबाइन  बसवण्यात  आले  आहेत या  रचणे  मध्ये  जे  टरबाइन  बसवले  आहेत त्यांना  फ्रान्सस  टरबाइन  म्हणतात. 

पाणी  नि  हे बोगद्या  मधून  येत असताना निमोळती  होत  आली असते त्यामुळे  कोलआकरमध्ये  ज्या वेळी  पाणी धडकते टरबाइन  फिरू  लागते  व टरबाइन जनरेटला  फिरवाचे  त्या  मुले  वीज  निर्मिती  हि होत  असते  पण येवढ वजनाने  जड व मोठे  जनरेटर आणि टरबाइन व  इतर उपकरणे  हे त्याच्या  जागे  वर  बसवणे  हे  एक आव्हान  होते  त्यासाठी  अभियंतानि  केबल वये व पुली केबल   हा  पर्या  शोधला  आपण  हे  केबल  वये  अजून  सुदा  हूवर  धरण  वर बघू  शेकतो इंटक टॉवर मधून  खाली  असलेल्या  टरबाइन  पर्येंत  पाणी  पोहोचवण्य  जे  नदीचे  पाणी  वाळवण्या साठी बोगदे  वापरले  होते. 

 ते धरणाचे  बांधकाम  पूर्ण झाल्यावर काहीच  काम न्हवते  म्हणहून त्यातील  एक  जवळ  असलेला  बोगदा  वापरला  व  पाणी  टरबाइन  पर्येत पोहोचवले पण  दुसऱ्या  साठी  परत  एक  बोगदा  पाडण्यात  आला. धरण  ओव्हरफ्लोव  होऊ  नये  म्हणून  जो  दुसरा बोगदा  नदीचे  पाणी  वाळवण्या साठी बोगदे  वापरले  होते त्यातील  एक  बोगदा  हा  ओव्हरफ्लोव  झालेली  पाणी  बाहेर  काढले  जाते त्यास स्पिलवे  असे  म्हणतात. 

ओव्हरफ्लो झालेले  हे  पाणी  बाहेर  काढने गरजेचे  असते  कारण हे  पाणी  खाली  असली  सर्व  उपक्रम  हे  बरबाद होण्याचा  खतरा  असतो  या  मुले  स्पिलवे  हे  महत्वाचे  आहे. या  धरणा  मधून  तबल २०८० मेगावॅट  वीज  हि  निर्मित  केली  जाते  व ११०००  घनमीटर  प्रतिसेकंद  हा जलप्रभाव  हा  या धरण  मधून  होऊ शिकतो.       

  

स्टॅच्यू ऑफ युनिटी

स्टॅच्यू ऑफ युनिटी

statue of unity 

स्टॅच्यू  ऑफ  युनिटी  हि  एक भारतातील  गुजरात  मधील  जगातील  सर्वात  मोठी  मूर्ती  आहे.  जी  सरदार  वलभाई  पटेल  याना  समर्पित  आहे. स्टॅच्यू  ऑफ  युनिटी  साठी  लोखंड  साठी  भारतातून  किसान  कडून अनुपयोगी  लोखंड  गोळा  करण्यात  आले होते . स्टॅच्यू  ऑफ युनिटी  चा  बांधकाम  कालावधी  पूर्ण  करण्यासाठी  ४ वर्ष लागले  होते .

 

हा  पुतळा  गुजरात  राज्यात   राजपिपला  शेराजवळ नमर्दा  नदीत  सरदार  धरणजवळ  साधू  या  बेटावर  उभारला  आहे  हे  स्मारक  तबल २०००० मीटर  शेत्रात  पसरले  आहे  या  प्रकल्पाचे  बांधकाम  हे ३१ ऑक्टोबर  २०१४ पासून  सूरु  झाले  व  ऑक्टोबर  २०१८  मध्ये  या  प्रकल्प  चे  काम  हे  पूर्ण  झाले 


 सरदार  वलभाई  पटेल  कोण  होते. 

ज्या  वेळी  भारता  ची   इंग्रजांच्या  गुलामगिरीतून  सुटका  झाली  त्या  वेळी  भारताचे  एकूण ५६५  संस्थाने  हे झाले  होते  व  त्या   संस्थाने  चे  वेगळे  राज होते  व   त्या  संस्थाने  देश  गोसीत  करण्याचा  डाव  हा  त्या  राज्यचा  होता. पण  हा  डाव  सरदार  वलभाई  यांनी  मोडून  काढून  त्या  संस्थाना  भारत  मध्ये  एकत्र  करून  घेण्या  मध्ये  सरदार  वलभाई  पटेल  यांची  मोठी  भूमिका  होती. सरदार  वलभाई  पटेल  यानाचा  जन्म  हा ३१ ऑक्टोबर  १८७५ या  वर्षी  झाला. त्याच्या  पिताजी  चे  नाव  हे जावेरभाई  व  आई  चे  नाव  लाडबाई  हे  होते.

  सरदार  वलभाई  पटेल यानि  माध्यमिक शाळा चे  शिक्षण  हे  २२ वर्षी  पूर्ण  केले  होते  त्याना  वकील  बनायच होत  व  त्या  साठी  त्यांनी २ वर्ष  मध्ये  च  विकीला  कडून  पुस्तेके  खेऊन  त्यांनी  परीक्षा  पास  केली  व  ते  वकिलाचे  शिक्षण  घेण्यासाठी  लंडन  या  देश  मध्ये  गेले  व   त्यांनी  हालाकी  मध्ये  त्यांनी शिक्षण  पूर्ण  केले व  शिक्षण  पूर्ण  झाल्या  नंतर  तेथील  सरकारने  अनेक  नोकरीच्या  संधी  दिल्या  पण  सरदार  वलभाई  पटेल  यानि  ती  संधी  खेतली  नाही  व ते  परत  भारत  मध्ये  परतले व  त्यांनी  अहमदाबाद  विकालाचा  सराव  केला  व  त्या  त्यांनी  खूप  प्रसिद्धी  मिळवली 

 १९१७ पासून  त्यांना  राजकारण मध्ये  रुची  येऊ  लागली  व त्यांनी १९१७ मध्ये  अहमदाबाद  कंमिसिओनर (commisioner) या  पदा  साठी  निवडूंक  लढली  व  जिंकली व  या  मुले  राजनीती  मध्ये  त्याची  रुची  अनेक  वाढली  व  ह्या  मध्ये खूप  प्रसिद्धी मिळवले  व  भारताच्या  राजनीती  मोठा  भाग  निर्माण  झाला.

 बार्डोली  जिल्या  मध्ये  ब्रिटीश  सरकार  हे  तेथील  शेतकरी  पासून  अधिक  चा  कर  हे  घेत  होते  त्यासाठी त्यांनी  एक  सत्यग्रह  अंदोलनणाची  रूपरेखा  तयार केली. व  त्यांनी  शेतकऱ्यांचे  प्रतिनिधीतव  केले  त्यामुळे  त्यांना  शेतकऱ्यान तर्फे  सरदार  हे  उपाधी  दिली  व  त्यांच्या  नवा  पुढे  सरदार  हे  लागले व  १९४८ ला  ज्या  वेळी  भारत देश हा  स्वतंत्र झाला  त्या  वेळी  भारताचे  पहिले  उपपंतप्रधान  वलभाई  पटेल हे झाले . सरदार  वलभाई  पटेल  यांचा  मूर्तीव  हा  १५ डिसेंबर  १९५० मध्ये  झाला . 

स्टॅच्यू ऑफ युनिटी बांधकाम 

या  मूर्तीला  बनवण्या  साठी  तब्बल  ३००  अभियांत्रिकी व  ४००० कामगार  हे  एकत्र  मिळून  काम  करत  होते. तबल  २५००० टन  स्टील  व  ७०००० सीमेत  चा  वापर  हा  या  मूर्ती  मध्ये  करण्यात  आला  आहे. सरदार  वलभाई  पटेल  यांच्या  मूर्तीचे  वजन  हे  २२००० हत्तीन  एवढे  अधिक  आहे  या  मूर्ती  ची  उंची  हि  १८२ मीटर  एवढी  आहे . हि  मूर्ती  येवढी  मोठी  आहे  कि  अवकाश  तुन  सुधा  दिसते. 

 या  मूर्तीला  बनवण्या  साठी    तबल अमिरिकेन  425 दशलक्ष डॉलर्स म्हणजेच  इंडियन  ३०००  कोटी  एवढा  खर्च  आला  आहे. या  मूर्ती साठी  ४२ महिने  चा  कालावधी  दिला  होता.  मूर्तीला  उभा  करण्या  साठी  पाया  मजबूत  करणे  गरजेचे  होते  व  या  मुले   १३० टन  लोखंड  या  पाय  मध्ये  घालण्यात  आले  व   हे  लोखंड  तबल  ३०००० कोटी  शेतकऱ्यांनी  ते लोखंड  दान  केले  व  ह्या  लोखंड  वर  प्रक्रिया  करून  ते  लोखंड वापरण्यात आले. 

या  मूर्ती चा  पाया  हा  एक  अलोम्पिक  स्वामिंग  पूल  एवढं  खोल  व  पसरत  होता  व  या  मध्ये  उत्तम  दर्जे  चे  काँक्रीट  वापरण्यात  आले  हे  काँक्रटीत  असे  होते  कि  ते  लगेच  निराकरण  होत  होते.  मूर्ती  बनवण्या  साठी  ज्यादा  तर  एक  मोठ्या  आकार  चा  एक  कॉलम  बांधला  जात  पण  सरदार  वलभाई  पटेल  यांच्या  मूर्ती  मध्ये  असे  डिझाइन  खेतले  होते  कि  त्यांचे  दोनी  पाय  वेगवेगळे  व  एक  पाय  पुढे  असे  दर्शवले  होते 

 व  सरदार  वलभाई  पटेल  हे धोती  खलाअत  होते  या  मुले  अभियांत्रिकि  पुढे  हे  एक  मोठे  आवाहन  होते  या  समस्यांची  तोड  असा  काढला  कि दोन  कॉलम  वेगवेगळे  घेतले .  मूर्तीला  येगदम  पूर्ण  बनवणे  शेक  नव्हते  या  मुले कास  या  धातू  चे वेगवेगळे  ६६५९  भाग  जोडून  या मूर्तीला   बनवण्यात आले  हे  भाग  जोडणे  एक  कोड्या  पेक्षा  कमी न्हवते  या  मूर्ती  च्या  छाती  जवळ  एक  गॅलरी  आहे  त्या  मधून  पर्येतक  बाहेरील  नजर  बगु  शेकतात.   

   

कोयना धरण

कोयना धरण

koyna dam

कोयना  धरण  हे  एक  महत्वाचे  धरण  आहे  व  महाराष्ट्रा  मधील  प्रमुख  धरण  आहे . कोयना  धरणा  मुळे  महाराष्ट्र  प्रकाशमय  व  सिचन  युक्त  झाले  आहे. कोयना  धरण  मधील  आजू  बाजूचा  परिसर  खूप  चांगला  आहे  व  तसेच  यथील  कोयना जलविद्युत प्रकल्प  पाहण्या  साठी  पर्यटन  खूप  मोठ्या  प्रमाणात  येत  आहे . आपण  या  आर्टिकल  मध्ये  कोयना धरणाचा इतिहास  बघणार आहोत . 

 

कोयना  धरण  हे  इसवी सन १९६३ मध्ये  बांधून  पूर्ण  करण्यात  आले  कोयना  धरण  हे  महाराष्ट्र  मध्ये  सातारा  जिल्या  मध्ये  पाठन  या  तालुक्यात  आहे. कोयना  धरण  चा  मुख्ये  हेतू  हा जमीन  सिचना  साठी  व  वीजनिर्निती  साठी  केला  जातो . कोयना  हा  धरण  महाराष्ट्र  मधील  मोठ्या  धरण  पैकी  एक  आहे. कोयना  धरण  हे  कोयना  नदी  वर  वसले  आहे. कोयना  धरण  च्या  साह्याने मोठ्या  प्रमाणात  वीजनिर्मिती हि  केली जाते  त्या  मुले या  धरण  ला  महाराष्ट्रची  जीवन  रेखा  असे  म्हणतात. 

कोयना धरणाचा इतिहास 

कोयना  हि  कुष्णा  नदी  ची  प्रमुख  उपनदी  कोयना  या  नदी   चे  उगमस्थान  हे  महाबळेश्वर मध्ये  आहे  कोयना  नदी  हि  सहयाद्री  मध्ये   किमान  ६५ किलोमीटर  अंतर  चा  प्रवास  हि  कोयना  नदी करते  या  भाग  मध्ये  खूप  पाऊस  पदाच्या  या  मुले  पुराची  स्तिती  निर्माण  होयची  तर  दुसरीकडे  महाराष्ट्र  मध्ये  काही  ठिकाणी  पाऊस  न  पडल्या  मुले  दुष्काळ  स्तिती  निर्माण  होत. यामुळे  शेती  च्या सिंचना  साठी  म्हणून  कोयना   धरण  बांधण्याचे  ठरले  पण  परत  वाढत्या  वीज  मागणी मुले  जलविदुत  प्रकल्प  करण्याचे  हे  कामास  सुरवात  झाली. 

कोयना  प्रकल्प  हि  मूळ  कल्पना  ब्रिटिशांची  सण  १९१० ते १९१५  मध्ये टाटा  या  कंपनी  ने सर्वे   केला  पण  त्या  वेळी झालेले पहिले  व  दुसऱ्या  महायुद्ध  मुले या  प्रकल्पला  अनेक  अडचणी आल्या  या  नंतर  १९४५ साली  बोंबे  इलेक्ट्रिक या  कंपनी  ने सर्वे  केला  व १९५३ साली  या प्रकल्प  ला भारत सरकार  तर्फे   मान्यता  मिळाली व  या  प्रकल्प व  प्रकल्प  मध्ये आडवे  येणारे  गावाचे  पुनर्वसनाचे  कामास सुरवात  झाली. अखेर  १९५४ साली  मुख्येमंत्री  मोरोजी  देसाई  यांच्या  असते कोयना  प्रकल्प   चे भूमिपुजन  झाले. व या  नंतर  प्रत्यक्ष्यात  कामास  सुरवात  झाली. 

  १९६० साली  पहिले व दुसऱ्या  टपाचे  काम  पूर्ण  झाले त्यावेळी  भारताचे  पंतप्रधान  यांनी  या  प्रकल्प  ला भेट  दिली  होती  १९६४ मध्ये  कोयना धरणाचे  काम  हे  पूर्ण  झाले  पण  १९६१ पासूनच  या  प्रकल्प  मध्ये  पाणी साठवण्यास सुरवात  झाली कोयना  धरणाची  लांबी हि ८०७. ७२ मीटर  इतकी  असून  उंची  हि  १०३. ०२ मीटर  एवढी  आहे.  हे  धरण महाराष्ट्र  मधील  सर्वाधीक  उंच  आहे. कोयना  धरण  ची  साठवण  क्षमता  हि २७९७. ४ दशलक्ष  घनमीटर  एवढी  आहे .  कोयना  धरण  बांधण्याचा  प्रकार  हा  रबर  काँक्रीट  आहे.  या  धरणाला  ६ वक्राकार  दरवाजे  आहेत. या दरवाज्या   मधून  ज्या  वेळी  धरण  पूर्ण  भरते  त्या  वेळी  पाणी  सोडले  जाते.

कोयना  धरण जलविद्युत प्रकल्प  

कोयना  धरण  व जलविदुत  हे  महाराष्ट्र  साठी शुक्तिपीठ  आहे. आज  वर्तमान  काळ मध्ये महाराष्ट्र  राज्यातील  एकूण जलविदुत  निर्मितीपैकी  सुमारे ५९  टक्के  वीज  हि  कोयना  प्रकल्प  महाराष्ट्र  मधील  जनतेला  पुरवत  असतो  १९६२ पासून  महाराष्ट्र्र  मधील  अंधार  दूर  करून  प्रकासमए करण्या  साठी  मोठी  भूमिका  आहे. कोयना  या  धरण  वर  २० मेगावॅट  चे  २ टर्बाइन , ७० मेगावॅट  चे  ४ टर्बाइन , ७५ मेगावॅट  चे  ४ टर्बाइन ,८० मेगावॅट  चे  ४ टर्बाइन, २५० मेगावॅट  चे  ४ टर्बाइन  असे  एकूण  १० टर्बाईन  बसवले  आहेत.  १९६०  मेगावॅट  एवढी  प्रचंड  वीजनिर्मिती  कोयना  प्रकल्प  मधून  तयार होते. 

कोयना धरणा  मध्ये वीज निर्मिती कशी केली जाते

धरणा  मध्ये  पाणी   जे  साठवले  जाते  त्यास   स्थिर ऊर्जा  असे  म्हणतात  ज्या  वेळी  पाणी  विशिष  असे  केलेल  वाट  या  वाटेचे  असी  रचना  केली  जाते  कि  पाण्याची  गती  हि  वाढले  जाते  व  अश्या  रचणे  मधून जेव्हा  पाणी  वाहते त्या  वेळी  त्या  स्थिर ऊर्जा  चे   रूपांतर हे  गतिज  ऊर्जा  मध्ये   होते व  ज्या  वेळी  टर्बाइन  च्या पाट्या  वर  पाणी  धडकते  व  पाते  फिरू  लागतात  त्या  वेळी गतिज  ऊर्जा  चे  रूपांतर  हे  यांत्रिक  ऊर्जा  मध्ये  होते  व  या  मध्ये  ज्या  वेळी  चुंबक  सोबत  असलेली  तांबाची  कॉल  या  मुले  घर्षण  निर्माण  होते  व विजेची  निर्मिती  हि  केली  जाते.  

  
 

    

satellites

satellite mhanje kay तीन प्रमुख सैटेलाइट प्रकार: Low Earth Orbit (LEO), Medium Earth Orbit (MEO), आणि Geostationary Orbit (GEO) पृथ्वीच्या कक्षा मध्ये दाखवलेले शिक्षणात्मक मराठी थंबनेल

 

🛰️ सैटेलाइट म्हणजे काय? प्रकार आणि उपयोग (Satellite in Marathi)


🔭 सैटेलाइट म्हणजे काय?

satellite mhanje kay? हा प्रश्न आज अनेकांना पडतो कारण आपण दररोज अशा तंत्रज्ञानाचा वापर करत असतो ज्यामध्ये सैटेलाईटची महत्त्वाची भूमिका असते या मध्ये  आपण   टीव्ही  पहाण्यासाठी , GPS, हवामानाचा अंदाज  संवाद साधण्या साठी ,म्याप  मध्ये एखादे  स्थान  पर्येंत  पोहोचण्या साठी अशी अनेक  कामे हि सैटेलाईट  मुले केली जाते  त्या मुले  सैटेलाईट  चे  महत्व  हे आपल्या  जीवन मध्ये  खूप  आहे.  

सैटेलाइट म्हणजे एक अशी वस्तू जी कोणत्यातरी मोठ्या ग्रहाभोवती एका ठराविक कक्षेत फिरते. उदाहरणार्थ, चंद्र हा पृथ्वीचा नैसर्गिक उपग्रह आहे. पण विज्ञान व तंत्रज्ञानाच्या सहाय्याने मानवाने मानवनिर्मित सैटेलाइट्स तयार केले, जे पृथ्वीच्या कक्षेत फिरतात आणि अनेक कामे करतात.

सैटेलाईट  हि  एका   टीव्ही  च्या  आकारा  एवढी  किंवा  ट्रेक  येवढी  आकाराची  असू  शिकते साईटलाईट  चा  आकार  हा  काम  जे आहे  त्या वरून ठरतो. सैटेलाईट  मध्ये  अनेक  यंत्र  हे त्या  सैटेलाईट  च्या  काम नुसार  लावण्यात येतात जशी कि संवाद  करण्या साठी  रिसिव्हर  पुथ्वी चे  जर image  काढण्या साठी  मोठे कॅमेरे लावण्यात आल्ये असता. 


📡 सैटेलाइट चे इतिहास (History of Satellites)

satellite mhanje kay हे समजून घेण्यासाठी आपल्याला थोडे इतिहासात जावे लागेल. सैटेलाईटचा इतिहास रशियाच्या स्पुतनिक-1 या पहिल्या मानवनिर्मित उपग्रहापासून सुरु होतो. 1957 साली, रशियाने हा उपग्रह पृथ्वीच्या कक्षेत यशस्वीरीत्या सोडला आणि त्यानंतर सैटेलाईट युग सुरू झाले. त्यानंतर अमेरिका, भारत, चीनसह अनेक देशांनी स्वतःचे सैटेलाईट पाठवले आहेत.


🌐 सैटेलाइट चे उपयोग:

आज आपण GPS वापरतो, टीव्ही बघतो, हवामानाचा अंदाज पाहतो हे सर्व सैटेलाइट मुळे शक्य आहे. या उपग्रहांमुळे संवाद, मॅपिंग, छायाचित्रण, इंटरनेट सेवा शक्य झाली आहे.


🛰️ सैटेलाइट चे प्रकार:

सैटेलाईट चे तसे अनेक प्रकार  हे  सैटेलाईट  च्या  कार्या  वरून  पडतात  पण  या  मध्ये  मुख्येतू   आपण  सैटेलाईट  पुथ्वीच्या  कोणत्या  ऑर्बिट  मध्ये  पाठवणार  आहे  या  वरून  त्या  सैटेलाईट  चे  प्रकार हे ठरत असतात. सैटेलाईटचे  प्रमुख  तीन  प्रकार  आहेत  ते  आपण पाहू. सैटेलाइट च्या कक्षेवरून खालील मुख्य तीन प्रकार विभागले जातात:

1️⃣ निम्न पृथ्वी कक्षा उपग्रह (LEO Satellite)

या प्रकारच्या सैटेलाईट मध्ये सैटेलाईट हि पुथ्वी च्या खूप जवळच्या ऑर्बिट मधून परिभ्रमण हे करत असते  आणि  या उपग्रह  ला   हि  पुथ्वी पासून  किमान १६०km ते १६००km एवढ्या  उंची  पर्येंत  त्या  उपग्रह  ला  स्थापण   केल्ये  जाते  या  ठराविक  ऑरबिट  मधून  तो  उपग्रह पुथ्वी भवती  खूप  वेगाने  फिरत  असता. याचा  उपयोग  हा  पुथ्वी  चे  इमेज  किंवा  पुथ्वी ला  सॅकॅनिंग व सर्वे  करण्या साठी  वापर  केला जातो.


  • उंची: १६० किमी ते १६०० किमी



  • उपयोग: पृथ्वीचे फोटो घेणे, पर्यावरण सर्वेक्षण


2️⃣ मध्यम पृथ्वी कक्षा उपग्रह (MEO Satellite)

या प्रकारच्या  उपग्रह  हे  मध्यम  वेगाने  पुथ्वी  च्या  भवती  फिरत असतात या  उपग्रहा  मध्ये एवढी  क्षमता  असते  हा   उपग्रह  फक्त  १२ तासा  मध्ये  पुथ्वी  भवित  संपूर्ण  चेकर  पूर्ण करतो. हा  उपग्रह  पुथ्वी  पासून १००००km ते २००००km एवढ्या उंची  पर्येंत   स्थापण  केले जाते  या  उपग्रहाचा  वापर  हा  नॅव्हिगेशन  करण्या साठी केला जातो.  


  • उंची: १०,००० किमी ते २०,००० किमी



  • उपयोग: GPS, नेव्हिगेशन सिस्टम


3️⃣ उच्च पृथ्वी कक्षा उपग्रह (GEO Satellite)

या  प्रकारच्या  उपग्रह ला  पुथ्वी  पासून ३६०००km   या  अंतर  पासून  खूप  लांब  पर्येंत  स्थापन  केले  जाते  हे  सुद्धा  उपग्रह  हे पुथ्वी  भवती  खूप  वेगाने  परब्रहमन  करत असतात  या  प्रकारच्या  उपग्रहाचा  वापर हा संवाद  करण्या  साठी केला जातो  उदाहरणात  ( मोबाइल इंटरनेट , tv, सेलफोन ). 


  • उंची: ३६,००० किमी



  • उपयोग: संवाद प्रणाली – मोबाईल, इंटरनेट, टीव्ही



🛰️ भारताचे सैटेलाईट कार्यक्रम

भारताचा सैटेलाईट प्रोग्राम खूप प्रगतीशील आहे. ISRO (Indian Space Research Organisation) हे भारताचे अंतराळ संशोधन संस्था आहे. भारताने अनेक उपग्रह अवकाशात यशस्वीपणे पाठवले आहेत, त्यात INSAT, GSAT, Cartosat, RISAT हे काही महत्त्वाचे उपग्रह आहेत. हे सैटेलाईट दूरदर्शन, हवामान अंदाज, कृषी निरीक्षण, आणि संप्रेषणासाठी वापरले जातात.


🌎 सैटेलाईटचे जीवनमान व नियंत्रण

प्रत्येक सैटेलाइटचे जीवनमान ठराविक असते – काही वर्षांपासून ते दशकेपर्यंत. सैटेलाइट एकदा अंतराळात गेल्यावर पृथ्वीवरील ग्राउंड स्टेशनमधून त्याचे नियंत्रण केले जाते. सैटेलाईटमध्ये बॅटरी, सोलर पॅनल, एंटेना, कॅमेरे, रिसिव्हर यासारखी उपकरणे असतात.


🌟 भविष्यातील सैटेलाईट उपयोग

भविष्यात सैटेलाइट्सचा वापर 5G इंटरनेट, स्मार्ट सिटी प्लॅनिंग, अंतराळ पर्यटन, कृषी डेटा विश्लेषण, आपत्ती व्यवस्थापन यासाठी होणार आहे. छोटे “नॅनो सैटेलाईट्स” भविष्यात मोठी क्रांती घडवू शकतात.


❓ वारंवार विचारले जाणारे प्रश्न (FAQ)

Q. सैटेलाइट म्हणजे काय?(satellite mhanje kay)
A. सैटेलाइट म्हणजे एका मोठ्या वस्तूभोवती फिरणारी लहान वस्तू, जसे की चंद्र पृथ्वीभोवती फिरतो.

Q. सैटेलाइटचे प्रकार कोणते आहेत?
A. निम्न पृथ्वी कक्षा, मध्यम पृथ्वी कक्षा, आणि उच्च पृथ्वी कक्षा – हे तीन प्रकार आहेत.

Q. सैटेलाइट चे उपयोग कोणकोणत्या क्षेत्रात होतात?
A. संवाद, GPS, हवामान अंदाज, टीव्ही प्रसारण, मॅपिंग इत्यादी.


🔗 संदर्भ:

 

मातीतून सोने कसे काढतात?

मातीतून सोने कसे काढतात?

How to extract gold from soil?

मातीतून सोने कसे काढतात?

GOLD

एक काळ असा होता की भरताला ‘सोनेरी पक्षी’ म्हणून संबोधले जात असे.  आजही भारतात सोन्याशिवाय लग्न होत नाही.  सोन तर सगळ्यांनीच बघितलं असेल पण याबद्दल माहिती खूप कमी लोकांना ६७,००० टन सोने पृथ्वीवर भेटला आहे.  किंवा त्याहून अधिक तुम्ही एका तासात स्टील बनवावे २ ते येईपर्यंत पृथ्वीवरील 80% सोने जमिनीत गाडले जाते.


समुद्रात इतके सोने आहे की जर ते सर्व बाहेर असेल तर ते स्वित्झर्लंड आणि जर्मनीसारख्या देशांच्या संपूर्ण सोन्यापेक्षा जास्त आहे ४ सोन्याची शुद्धता कॅरेटमध्ये मोजली जाते.  सोने  १० १२ १४ १८ २२आणि २४ कॅरेटचे असू शकते. पण बाजार मध्ये विकण्या साठी २४ कॅरेटचे  सोने नसते कारण सोने हे खूप मऊ धातू आहे त्या मुळे सोन्या मध्ये तांबे हा धातू वापरला जातो.

खूप वर्षया पूर्वी पुथ्वी वर धूम केतूचा मारा झाला होता. याचे  ढसे चंद्रा वर देखील आहेत.  बोलले जाते की पृथ्वीवर देखील सर्व सोन बाहेरील अवकाशात आलेला आहे.बाहेरील अवकाशातून सोने हे धूमकेतु  च्या सहाय्याने  आले आहे. हे सोने पुथ्वी च्या भूगर्भात जमा झाले.  

सोने मध्ये लोड शिरा ठेव:

लोड एक धातू-बेअरिंग डिपॉझिट आहे जो बेडरोकच्या थरांमध्ये एम्बेड केलेला आढळतो. आग्नेय किंवा रूपांतरित खडकांमध्ये होणार्‍या लोड डिपॉझिट्समध्ये सामान्यत: सोने आणि चांदी असते, तर गाळाच्या खडकांमधील लोड निक्षेपांमध्ये बहुतेकदा लोह किंवा युरेनियम धातू असतात.

मातीतून सोने कसे काढतात?

lodes or veins

लोड डिपॉझिटसाठी काढण्याची प्रक्रिया कठीण खडक खाण आहे. एकटे सोडल्यास, नैसर्गिक हवामान आणि धूप अखेरीस लोड्सचे विघटन करेल आणि धातूंचे आतील विस्थापन करेल, सामान्यतः पाण्याद्वारे. ही प्रक्रिया प्लेसर ठेवी तयार करते.

लोड डिपॉझिटमध्ये सामान्यतः सोने असते. जेव्हा हायड्रोथर्मल द्रावण, म्हणजे गरम पाण्याच्या झऱ्यांसारखे गरम द्रव, सोन्याचे वाहक खडकांमधून प्रवास करतात आणि काही सोने इतर खडकांच्या रचनेत घेऊन जातात तेव्हा हे घडतात. येथे, सोने नवीन विदारकांमध्ये पुन्हा जमा केले जाते, शिरा तयार करतात.

भूगर्भातील खाण तंत्राचा वापर लोडे डिपॉझिटसाठी केला जातो. खरं तर, जगातील बहुतेक सोने पुनर्प्राप्त करण्यासाठी लोड मायनिंग ही पद्धत वापरली जाते. खडकाच्या खाणकामाच्या या प्रकारात उभ्या किंवा आडव्या शाफ्ट बुडवल्या जातात आणि नंतर निक्षेपापर्यंत पोहोचण्यासाठी आणि धातू काढण्यासाठी घन खडकांच्या निर्मितीमध्ये ड्रिलिंग आणि ब्लास्टिंगचा समावेश होतो.

सोने मातीतून काढण्याचा  प्रक्रिया: 

सोने मातीतून काढण्याच्या अनेक आधुनिक प्रक्रियाआहेत.कुठली प्रक्रिया वापराची ते लोड व व्हेन्स  वरून धरत असते.  

मातीतून सोने कसे काढतात?

floatation process 

फ्लोटेशन प्रक्रिया:

फ्रॉथ फ्लोटेशन सोन्याच्या रेणूंच्या हायड्रोफोबिक गुणधर्मांचे शोषण करून कार्य करते. प्रथम, धातूचे अत्यंत बारीक पावडर बनवले जाते. स्लरी तयार करण्यासाठी चूर्ण धातू पाण्यात मिसळले जाते, जे सोन्याची हायड्रोफोबिसिटी वाढवण्यासाठी सर्फॅक्टंटमध्ये मिसळले जाते. हे मिश्रण डिस्टिल्ड वॉटरने भरलेल्या मोठ्या टाकीमध्ये ठेवले जाते. हवेचे फुगे टाकीमध्ये टाकले जातात आणि पाणी उत्तेजित होते.

सर्फॅक्टंटच्या साहाय्याने, पाणी हवेच्या बुडबुड्यांमध्ये सोन्याला मागे टाकते, जे शीर्षस्थानी वाढते – एक फुगेदार सोनेरी फेस तयार करते. फेस पृष्ठभागावरून स्किम केला जातो आणि गोळा केला जातो आणि नंतर धातूच्या सोन्यामध्ये घनरूप होतो. दरम्यान, शेपटी आणि टाकाऊ पदार्थ टाकीच्या तळाशी बुडतात.

यांत्रिक खाण उपकरणांसह, फ्रॉथ फ्लोटेशनने सोन्याच्या खाणींची कार्यक्षमता नाटकीयरित्या सुधारली. या प्रक्रियेमुळे, खाण कामगार आणि रिफायनर्स पूर्वीच्या शक्यतेपेक्षा कमी दर्जात धातूपासून दर्जेदार खनिजे काढण्यास सक्षम आहेत – यामुळे कदाचित 20 व्या शतकातील खाण उद्योगातील सर्वात महत्त्वाचा नवकल्पना आहे 

सायनिडेशन प्रक्रिया:

मातीतून सोने कसे काढतात?

सोन्याचे सायनाईडेशन (याला सायनाइड प्रक्रिया किंवा मॅकआर्थर-फॉरेस्ट प्रक्रिया असेही म्हणतात) हे सोन्याचे पाण्यात विरघळणाऱ्या समन्वय संकुलात रूपांतर करून कमी दर्जाच्या धातूपासून सोने काढण्याचे हायड्रोमेटालर्जिकल तंत्र आहे. सोने काढण्यासाठी ही सर्वात सामान्यपणे वापरली जाणारी लीचिंग प्रक्रिया आहे. सामान्यतः फ्रॉथ फ्लोटेशन नंतर, चांदीच्या उत्खननामध्ये सायनिडेशनचा मोठ्या प्रमाणावर वापर केला जातो.

सोने पुनर्प्राप्त करण्यासाठी खनिज प्रक्रियेसाठी अभिकर्मकांचे उत्पादन जागतिक स्तरावर सायनाइडच्या 70% पेक्षा जास्त वापराचे प्रतिनिधित्व करते. या प्रक्रियेतून तांबे, जस्त आणि चांदीचा समावेश असलेल्या इतर धातूंचा समावेश होतो, परंतु सोने हे या तंत्रज्ञानाचे मुख्य चालक आहे.

सायनाइडच्या अत्यंत विषारी स्वरूपामुळे, ही प्रक्रिया विवादास्पद आहे आणि जगाच्या काही भागांमध्ये त्याच्या वापरावर बंदी आहे. सोन्याच्या खाण उद्योगात सायनाइड सुरक्षितपणे वापरता येते.सायनाइडच्या सुरक्षित वापरासाठी मुख्य वैशिष्ट्य म्हणजे 10.5 वरील अल्कधर्मी pH स्तरावर पुरेसे pH नियंत्रण सुनिश्चित करणे. औद्योगिक स्तरावर, पीएच नियंत्रण प्रामुख्याने चुना वापरून साध्य केले जाते, सोन्याच्या प्रक्रियेत एक महत्त्वपूर्ण सक्षम अभिकर्मक म्हणून.

एकत्रीकरण प्रक्रिया:

मातीतून सोने कसे काढतात?

amalgamation process


सोन्याच्या प्रक्रियेत: एकत्रीकरण. मौलिक सोने (आणि चांदी देखील) पारामध्ये विरघळते, त्यामुळे जेव्हा धातूचे कण ताज्या पाराच्या पृष्ठभागाच्या संपर्कात आणले जातात तेव्हा ते ओले आणि विरघळले जातात, ज्यामुळे मिश्रण नावाचा मिश्रधातू तयार होतो.
मिश्रीकरण हे पारा सह लेपित तांब्याच्या प्लेट्सवर धातूची स्लरी पास करून, एक दंडगोलाकार किंवा शंकूच्या आकाराच्या भांड्यात धातू आणि पाराची स्लरी मिसळून किंवा एक बॉल, रॉड किंवा पेबल मिलमध्ये धातूचे मिश्रण करून पूर्ण केले जाते. खनिज मॅट्रिक्समधून सोने मुक्त करा आणि नंतर मिलमध्ये पारा जोडणे आणि पारामध्ये सोने विरघळेपर्यंत पीसणे सुरू ठेवा. घनदाट मिश्रण नंतर मिल डिस्चार्जमध्ये आता नापीक धातूपासून वेगळे केले जाते. अशुद्धता काढून टाकण्यासाठी गाळणे आणि धुतल्यानंतर, पारा काढून टाकण्यासाठी मिश्रण सीलबंद रिटॉर्टमध्ये गरम केले जाते, जे पुन्हा वापरण्यासाठी पुनर्प्राप्त केले जाते.
जरी सोन्याच्या पुनर्प्राप्तीमध्ये अद्याप एकत्रीकरणाचा सराव मोठ्या प्रमाणावर केला जात असला तरी, ऑपरेटर किंवा पर्यावरण यापैकी एकाच्या पारा विषबाधाच्या वास्तविक धोक्यांनी त्याचा वापर मर्यादित केला आहे आणि दूषिततेपासून बचाव सुनिश्चित करण्यासाठी काळजीपूर्वक डिझाइन केलेल्या उपकरणांचा वापर करण्यास भाग पाडले आहे.

लगदा मध्ये कार्बन:

मातीतून सोने कसे काढतात?

carbon in pulp processing

कार्बन इन पल्प (सीआयपी) हे सोन्याच्या पुनर्प्राप्तीसाठी काढण्याचे तंत्र आहे जे सोन्याच्या सायनाईडेशन प्रक्रियेचा भाग म्हणून सायनाइड द्रावणात मुक्त केले गेले आहे. 1980 च्या दशकाच्या सुरुवातीस, पल्पमधील कार्बन ही एक सोपी आणि स्वस्त प्रक्रिया म्हणून ओळखली जाते.

सक्रिय कार्बन डायसायनोऑरेटसाठी स्पंजसारखे कार्य करते, सोने काढण्याच्या तंत्रज्ञानातील मुख्य विरघळणारी सोन्याची प्रजाती. हार्ड कार्बन कण (धातूच्या कणांच्या आकारापेक्षा बरेच मोठे) द्रावणात मिसळले जाऊ शकतात. गोल्ड सायनाइड कॉम्प्लेक्स कार्बनवर शोषून घेते आणि ते पुन्हा धातूमध्ये कमी करण्याचा प्रस्ताव आहे. कार्बनचे कण धातूच्या कणांपेक्षा खूप मोठे असल्याने, खडबडीत कार्बन नंतर वायर जाळी वापरून स्क्रीनिंग करून स्लरीपासून वेगळे केले जाऊ शकते

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Hindu Dharma 33 koti dev: धक्कादायक सत्य उघड! खरंच करोड देव आहेत का?

hindu dharma 33 koti dev देवतांचे प्रतीकात्मक चित्रण

Hindu Dharma 33 koti dev: धक्कादायक सत्य उघड! खरंच करोड देव आहेत का?

hindu dharma 33 koti dev या संकल्पनेभोवती अनेकदा गैरसमज दिसून येतात. भारतीय सनातन धर्मामध्ये या ३३ कोटी देवांचे (प्रकारांचे) खूप महत्त्व आहे, आणि या लेखात आपण याच ३३ प्रकारच्या उच्च देवतांबद्दल सविस्तर माहिती घेणार आहोत. hindu dharma 33 koti dev या शब्दाचा खरा अर्थ समजून घेणे महत्त्वाचे आहे, कारण ‘कोटी’ या संस्कृत शब्दाचे दोन अर्थ आहेत: एक ‘करोड’ (१,००,००,०००) आणि दुसरा ‘प्रकार’ किंवा ‘उच्चतम’.

हिंदू धर्म, हा भारतीय उपखंडातील सर्वात मोठा आणि महत्त्वाचा धर्म वा जीवनपद्धती आहे. [आणखी वाचा:महाकुंभ 2025 मध्ये काय विशेष आहे?] आजही सनातनी हिंदू लोक स्वधर्माचा ‘हिंदू’ असा उल्लेख करतात. संस्कृत भाषेत याचा अर्थ ‘शाश्वत मार्ग’ असा होतो. निरीश्वरवाद, सर्वेश्वरवाद, अनेकेश्वरवाद, एकेश्वरवाद, नास्तिकता – अशी सर्व रूपे या धर्मात एकत्रितपणे दिसतात. अनेक विद्वानांच्या मते, हिंदू धर्म हा विविध भारतीय संस्कृती आणि परंपरांचे संमिश्रण आहे, ज्याचा कोणीही संस्थापक नाही.


३३ कोटी देव: संकल्पना आणि महत्त्व

३३ कोटी देव या शब्दाचा उल्लेख संस्कृतमध्ये लिहिलेल्या वेद, पुराणे आणि अन्य ग्रंथांमध्ये आढळतो. या कोणत्याही ग्रंथात ‘३३ करोड’ या शब्दाचा उल्लेख नाही, तर तो उल्लेख ‘कोटि’ या शब्दाचा आहे. त्यामुळेच कदाचित ‘कोटि’ शब्दाचा अर्थ ‘करोड’ असा समजला गेला. परंतु, संस्कृतमध्ये ‘कोटि’ या शब्दाचा अर्थ केवळ ‘करोड’ असा होत नाही, तर तो ‘उच्चतम’, ‘सर्वोच्च’ आणि ‘अत्यंत’ असाही होतो. शून्याच्या शोधामुळे भारतीय गणितज्ञांनी मोठ्या संख्या लिहिण्यास सुरुवात केली आणि १,००,००,००० ला ‘कोटी’ असे नाव रूढ झाले. पण hindu dharma 33 koti dev म्हणजे ३३,००,००,००० ही देवतांची संख्या नसून, ते ३३ प्रकारचे उच्च देव आहेत. सामान्य भाषेत ‘कोटी’ शब्दाचा दुसरा अर्थ ‘करोड’ असल्यामुळे ३३ करोड देवी-देवता असल्याची मान्यता प्रख्यात झाली, जो एक गैरसमज आहे.

या तेहतीस कोटी/प्रकारच्या देवांमध्ये मुख्यतः आठ वासू, अकरा रुद्र, बारा आदित्य आणि दोन अश्विनीकुमारांचा समावेश होतो. काही ठिकाणी ३३ कोटी देवांमध्ये इंद्र आणि प्रजापतीला बारा आदित्यात न ठेवता, दोन अश्विनीकुमारांऐवजी गणले गेले आहे.


बारा आदित्य: हिंदू धर्मातील १२ देव

आदित्य हे देवांचे एक महत्त्वाचे गण आहेत, जे विश्वाचे विविध पैलू नियंत्रित करतात. त्यांना सामाजिक वर्तणुकीचे प्रतीक देखील मानले जाते.

संदर्भ: [https://en.wikipedia.org/wiki/Adityas]

बारा आदित्यांची नावे आणि त्यांचे महत्त्व:

  1. अंशमान (हिस्सा): वस्तूंचे किंवा ज्ञानाचे विभाजन करणारा.
  2. अर्यमन (श्रेष्ठता): मानवी समाजातील श्रेष्ठता आणि नियमांचे पालन करणारा.
  3. इंद्र / शक्र (नेत्रत्व): देवांचा राजा आणि नेतृत्वाचे प्रतीक.
  4. त्वष्टृ (कौशल्य/कला/शिल्प): निर्मिती आणि कलाकौशल्याचा देव.
  5. पर्जन्य: पाऊस आणि ढगांचा देव, जो पृथ्वीला जीवन देतो.
  6. पूषन (समृद्धि): पोषण, समृद्धि आणि मार्गांचे रक्षण करणारा देव.
  7. भग (धरोहर): संपत्ती, भाग्य आणि वारसा देणारा.
  8. मित्र (मित्रता/ सहयोगी): मित्रत्व, करार आणि सहकार्याचे प्रतीक.
  9. वरुण (भाग्य): जल, समुद्र आणि नैतिक नियमांचा देव.
  10. विवस्वत् (सामाजिक नियम): सामाजिक नियमांचे आणि प्रकाशमान अस्तित्वाचे प्रतीक.
  11. विष्णू / वामन (ब्रम्हांडीय नियम): विश्वाचे पालनकर्ता आणि वैश्विक नियमांचे रक्षण करणारा. (भगवान विष्णू आणि त्यांच्या अवतारांबद्दल अधिक जाणून घ्या.)
  12. धाता / प्रजापती: निर्माता आणि विश्वाचा आधारस्तंभ.

अकरा रुद्र: शिवाचे विविध पैलू आणि त्यांचे महत्त्व

रुद्र हे देवांचे असे स्वरूप आहेत, जे विध्वंसक तसेच कल्याणकारी दोन्ही भूमिकांमध्ये दिसतात. ते शिवाचेच विविध पैलू मानले जातात.

अकरा रुद्रांची नावे आणि त्यांचे महत्त्व:

  • पाच अमूर्तः (निराकार): हे रुद्राचे निराकार स्वरूप आहेत.
    1. आनंद: परम सुख आणि समाधानाचे प्रतीक.
    2. विज्ञान (ज्ञान): उच्चतम ज्ञान आणि बुद्धीचे प्रतीक.
    3. मानस (विचार): मन आणि विचारांचे प्रतीक.
    4. प्राण (श्वास किंवा जीवन): जीवनातील ऊर्जा आणि श्वासाचे प्रतीक.
    5. वाक (भाषण): वाणी आणि अभिव्यक्तीचे प्रतीक.
  • शिवाचे पाच नावेः हे रुद्राचे साकार, शिवरूपी स्वरूप आहेत.
    1. ईशान (वैभव): समृद्धी, ईशान्य दिशेचा स्वामी.
    2. तत्पुरुष: पुरुष तत्वाचे प्रतीक, ध्यान आणि तपस्येशी संबंधित.
    3. सद्योजात (नवजात किंवा जन्म घेतलेला): त्वरित जन्म घेणारा, निर्मितीचे प्रतीक.
    4. वामदेव: सुंदर स्वरूप आणि वाम मार्गाशी संबंधित.
    5. अघोरा: भयावह परंतु कल्याणकारी स्वरूप, अज्ञानाचा नाश करणारा.
  • आणि आत्मा: हे अकरावे रुद्र, सर्व सजीवांमध्ये वास करणारा अविनाशी ‘आत्मा’.

अष्टवसू: निसर्गातील ८ देव आणि त्यांचे कार्य

अष्टवसू हे निसर्गाच्या आठ मूलभूत घटकांचे प्रतीक आहेत, जे पृथ्वीवरील जीवनासाठी आवश्यक आहेत.

अष्टवसूंची नावे:

  1. अपस (जल): पाण्याचे प्रतीक, जीवनाचा आधार.
  2. ध्रुव (ध्रुव तारा): स्थिरता आणि अचलतेचे प्रतीक.
  3. सोम (चंद्र): चंद्राचे प्रतीक, शीतलता आणि पोषणाचे दाता.
  4. धरा (भुमी): पृथ्वीचे प्रतीक, आधार देणारी आणि धारण करणारी.
  5. अनिल (वायू): वाऱ्याचे प्रतीक, ऊर्जा आणि गतीचा स्त्रोत.
  6. अनल (अग्नि): अग्नीचे प्रतीक, ऊर्जा आणि शुद्धीकरणाचे साधन.
  7. द्यौस (अंतरिक्ष): आकाशाचे प्रतीक, सर्व काही सामावून घेणारे.
  8. प्रभास (सुर्योदय): सूर्योदयाचे प्रतीक, प्रकाश आणि नव्या सुरुवातीचा दाता.

दोन अश्विनीकुमार: आरोग्य आणि विज्ञानाचे वैदिक देव

अश्विनीकुमार हे दोन जुळे वैदिक देव आहेत, जे औषध, आरोग्य, वैद्यक आणि विज्ञानाशी संबंधित आहेत. त्यांचा ऋग्वेदात ‘अश्विनौ’ नावाने उल्लेख आहे. ते देवांचे वैद्य म्हणून ओळखले जातात आणि त्यांना सौंदर्य, आरोग्य आणि नवजीवन प्रदान करणारे मानले जाते.

अधिक वाचा: [https://vedabase.io/en/library/]


निष्कर्ष

अशा प्रकारे, hindu dharma 33 koti dev ही संकल्पना ‘करोड’ या संख्येऐवजी ‘प्रकार’ किंवा ‘श्रेणी’ दर्शवते. हे बारा आदित्य, अकरा रुद्र, आठ वसू आणि दोन अश्विनीकुमार मिळून एकूण ३३ उच्च देवतांचे प्रतिनिधित्व करतात, जे विश्वाच्या विविध पैलूंचे आणि निसर्गाच्या शक्तींचे प्रतीक आहेत. या देवता केवळ आकडेवारी नसून, त्या हिंदू धर्माच्या विशाल आणि वैविध्यपूर्ण आध्यात्मिक आणि तात्विक संरचनेचा अविभाज्य भाग आहेत. हा लेख तुम्हाला hindu dharma 33 koti dev या संकल्पनेबद्दलचे गैरसमज दूर करण्यास मदत करेल अशी आशा आहे.